1. भूमिका
पल्लव वंश दक्षिण भारत के इतिहास में एक अत्यंत प्रभावशाली और दीर्घकालिक राजवंश के रूप में जाना जाता है। इस वंश का शासन लगभग चौथी शताब्दी ईस्वी से नौवीं शताब्दी ईस्वी तक रहा, जिसके दौरान दक्षिण भारत की राजनीति, धर्म, कला और संस्कृति ने स्पष्ट रूप से एक नया स्वरूप ग्रहण किया। पल्लवों का उदय उस काल में हुआ जब दक्षिण भारत छोटे-छोटे राज्यों और सामंतों में विभाजित था। ऐसे समय में पल्लवों ने एक संगठित प्रशासन और सुदृढ़ शासन व्यवस्था के माध्यम से अपनी स्वतंत्र पहचान स्थापित की।
पल्लवों की राजधानी कांचीपुरम केवल एक राजनीतिक केंद्र नहीं थी, बल्कि वह विद्या, धर्म और सांस्कृतिक गतिविधियों का भी प्रमुख केंद्र रही। प्राचीन काल में कांचीपुरम को दक्षिण भारत की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में देखा जाता था। यहाँ वैदिक शिक्षा, बौद्ध और जैन परंपराएँ तथा शैव और वैष्णव भक्ति—सभी का समन्वय देखने को मिलता है। इस बहुधार्मिक वातावरण ने पल्लव शासन को सामाजिक स्थिरता और वैचारिक गहराई प्रदान की।
पल्लव वंश का ऐतिहासिक महत्व केवल राजनीतिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं है। इस राजवंश ने द्रविड़ स्थापत्य शैली के विकास में निर्णायक भूमिका निभाई। शैलकृत मंदिरों से लेकर संरचनात्मक पत्थर मंदिरों तक की यात्रा पल्लव काल में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। महाबलीपुरम के रथ मंदिर, गुफा मंदिर और भित्ति शिल्प आज भी पल्लवों की कलात्मक दृष्टि और तकनीकी कौशल के साक्ष्य हैं। यही परंपरा आगे चलकर चोल स्थापत्य की आधारशिला बनी।
धार्मिक दृष्टि से पल्लव शासक सहिष्णु थे। प्रारंभिक काल में जैन और बौद्ध प्रभाव दिखाई देता है, जबकि बाद के समय में शैव और वैष्णव परंपराओं को व्यापक संरक्षण मिला। नयनार और आलवार संतों के माध्यम से भक्ति परंपरा को समाज के व्यापक वर्गों तक पहुँच मिली, जिससे धार्मिक जीवन अधिक लोकाभिमुख हुआ।
इस प्रकार पल्लव वंश का इतिहास केवल राजाओं और युद्धों की कथा नहीं है, बल्कि यह दक्षिण भारतीय समाज के राजनीतिक संगठन, धार्मिक चेतना और कलात्मक उत्कर्ष का समग्र चित्र प्रस्तुत करता है। उनकी विरासत आज भी दक्षिण भारत की सांस्कृतिक पहचान में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है।
2. पल्लवों की उत्पत्ति से संबंधित सिद्धांत
पल्लव वंश की उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों में एकमत नहीं है। पल्लवों का प्रारंभिक इतिहास स्पष्ट न होने के कारण उनके मूल स्थान और जातीय पहचान पर अनेक सिद्धांत प्रस्तुत किए गए हैं। इन सिद्धांतों का आधार मुख्यतः शिलालेख, ताम्रपत्र, साहित्यिक साक्ष्य तथा विदेशी विवरण हैं। यही कारण है कि पल्लवों की उत्पत्ति को लेकर विवाद आज भी बना हुआ है।
एक प्रमुख मत यह मानता है कि पल्लव दक्षिण भारत के स्थानीय जनजातीय शासक थे। इस सिद्धांत के अनुसार पल्लव मूल रूप से टोंडईमंडलम क्षेत्र के निवासी थे और धीरे-धीरे उन्होंने राजनीतिक शक्ति प्राप्त की। “पल्लव” शब्द को तमिल भाषा के “टोंडई” शब्द से जोड़ा जाता है, जिसका अर्थ लता या बेल होता है। इसी कारण पल्लवों को “लताओं के प्रदेश” का शासक भी कहा गया है। यह मत पल्लवों को पूर्णतः स्वदेशी राजवंश मानता है।
दूसरा सिद्धांत पल्लवों की उत्पत्ति को विदेशी पहलव (पार्थियन) जाति से जोड़ता है। कुछ विद्वानों का मानना है कि “पल्लव” शब्द “पहलव” का ही संस्कृत रूप है और ये लोग उत्तर-पश्चिम भारत से दक्षिण भारत की ओर आए। हालांकि इस सिद्धांत के पक्ष में ठोस पुरातात्विक साक्ष्य कम उपलब्ध हैं, फिर भी नाम की समानता के आधार पर इसे पूरी तरह नकारा भी नहीं जा सकता।
एक अन्य महत्वपूर्ण मत यह है कि पल्लव पहले सातवाहन शासकों के सामंत थे। सातवाहन साम्राज्य के पतन के बाद पल्लवों ने दक्षिण भारत में स्वतंत्र सत्ता स्थापित की। प्रारंभिक पल्लव शासकों के अभिलेखों में उन्हें किसी बड़े साम्राज्य के अधीनस्थ के रूप में देखा गया है, जिससे यह सिद्धांत मजबूत होता है।
कुछ इतिहासकार पल्लवों को क्षत्रिय मूल का राजवंश मानते हैं। पल्लव शासकों ने अपने अभिलेखों में स्वयं को ब्राह्मणों का संरक्षक और वैदिक परंपराओं का पालनकर्ता बताया है। इससे यह संकेत मिलता है कि वे सामाजिक रूप से उच्च वर्ग से संबंध रखते थे।
इन विभिन्न मतों के बावजूद यह स्पष्ट है कि पल्लव वंश ने चौथी शताब्दी ईस्वी के आसपास कांचीपुरम को राजधानी बनाकर एक सशक्त और दीर्घकालिक शासन की नींव रखी। उनकी उत्पत्ति चाहे जिस भी स्रोत से हुई हो, उनका ऐतिहासिक महत्व निर्विवाद है।
3. पल्लव राज्य का भौगोलिक विस्तार

पल्लव वंश का भौगोलिक विस्तार दक्षिण भारत के इतिहास को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी क्षेत्रीय आधार पर पल्लवों की राजनीतिक शक्ति, सांस्कृतिक प्रभाव और समुद्री संपर्क विकसित हुए। पल्लवों का मुख्य शासन क्षेत्र उत्तरी तमिलनाडु और दक्षिणी आंध्र प्रदेश में फैला हुआ था। प्राचीन काल में इस क्षेत्र को “टोंडईमंडलम” के नाम से जाना जाता था, जो पल्लव प्रशासन का केन्द्रीय भाग माना जाता था।
पल्लवों की राजधानी कांचीपुरम इस भौगोलिक व्यवस्था का केंद्र बिंदु थी। कांचीपुरम रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत उपयुक्त स्थान पर स्थित थी—यह एक ओर कृषि प्रधान आंतरिक क्षेत्र से जुड़ी थी, तो दूसरी ओर बंगाल की खाड़ी की ओर जाने वाले व्यापारिक मार्गों से भी संबद्ध थी। इस स्थिति ने पल्लवों को आर्थिक समृद्धि और सैन्य सुरक्षा दोनों प्रदान की।
पल्लव साम्राज्य का विस्तार समय-समय पर बदलता रहा। शक्तिशाली शासकों के काल में उनका प्रभाव कृष्णा नदी के दक्षिणी भागों तक और कभी-कभी कावेरी नदी के उत्तर तक देखा गया। हालांकि पल्लवों का मूल क्षेत्र मुख्यतः तटीय और अर्ध-तटीय था, फिर भी उन्होंने आंतरिक पठारी क्षेत्रों पर भी नियंत्रण स्थापित किया। इससे उन्हें कृषि, खनिज और मानव संसाधनों का व्यापक आधार मिला।
भौगोलिक दृष्टि से पल्लवों का एक और महत्वपूर्ण क्षेत्र महाबलीपुरम था, जो उनका प्रमुख बंदरगाह नगर माना जाता है। यह स्थान समुद्री व्यापार और विदेशी संपर्कों के लिए अत्यंत उपयोगी था। दक्षिण-पूर्व एशिया और चीन के साथ सांस्कृतिक तथा व्यापारिक संबंधों में इस बंदरगाह की विशेष भूमिका रही। समुद्र तट के निकट होने के कारण यहाँ धार्मिक और कलात्मक गतिविधियाँ भी विकसित हुईं, जिनका प्रमाण आज के शैलकृत स्मारकों में मिलता है।
पल्लव राज्य का यह भौगोलिक विस्तार उन्हें न केवल राजनीतिक रूप से सशक्त बनाता था, बल्कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान का माध्यम भी था। उत्तर और दक्षिण भारत के बीच स्थित होने के कारण पल्लव क्षेत्र एक सेतु की भूमिका निभाता था, जहाँ आर्य और द्रविड़ परंपराओं का समन्वय हुआ। इस प्रकार पल्लवों का भौगोलिक आधार उनके दीर्घकालिक प्रभाव और ऐतिहासिक महत्व का प्रमुख कारण बना।
4. पल्लव शासक
4.1 प्रारंभिक पल्लव शासक
पल्लव वंश के प्रारंभिक शासकों का काल पल्लव इतिहास का सबसे जटिल और अपेक्षाकृत अस्पष्ट चरण माना जाता है। इस काल की जानकारी मुख्यतः ताम्रपत्रों, शिलालेखों और बाद के साहित्यिक स्रोतों से प्राप्त होती है। प्रारंभिक पल्लव शासक पूर्णतः स्वतंत्र शासक नहीं थे, बल्कि वे पहले दक्षिण भारत की बड़ी राजनीतिक शक्तियों के अधीन सामंतों के रूप में कार्य करते थे। विशेष रूप से सातवाहन शासकों के पतन से पूर्व पल्लवों की राजनीतिक स्थिति सीमित थी।
इतिहासकारों के अनुसार प्रारंभिक पल्लव शासकों में सिंहवर्मन का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यद्यपि सिंहवर्मन से पहले भी कुछ शासकों के अस्तित्व के संकेत मिलते हैं, परंतु उन्हें स्वतंत्र पल्लव शासक नहीं माना जाता। सिंहवर्मन के काल में पल्लवों ने पहली बार एक संगठित सत्ता के रूप में उभरना प्रारंभ किया। हालांकि इस काल में भी उनका राजनीतिक प्रभाव सीमित था और वे क्षेत्रीय शक्तियों के साथ संतुलन बनाकर शासन करते थे।
प्रारंभिक पल्लव शासकों का प्रशासन मुख्यतः स्थानीय स्तर पर केंद्रित था। ग्राम सभाएँ, भूमि अनुदान और ब्राह्मणों को संरक्षण जैसी व्यवस्थाएँ इस काल में विकसित होने लगी थीं। इससे यह स्पष्ट होता है कि पल्लव शासक धीरे-धीरे एक स्थायी शासन प्रणाली की नींव रख रहे थे। इसी दौर में कांचीपुरम का महत्व बढ़ने लगा, जो आगे चलकर पल्लवों की राजधानी और शक्ति का केंद्र बनी।
इन प्रारंभिक शासकों की एक प्रमुख विशेषता यह थी कि उन्होंने धार्मिक और सामाजिक स्थिरता बनाए रखने पर विशेष ध्यान दिया। यज्ञ, दान और वैदिक परंपराओं को संरक्षण देकर उन्होंने स्थानीय समाज का समर्थन प्राप्त किया। इससे उन्हें शासन को वैधता मिली और भविष्य में स्वतंत्र साम्राज्य की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ।
यद्यपि प्रारंभिक पल्लव शासकों की उपलब्धियाँ सीमित प्रतीत होती हैं, फिर भी उनका ऐतिहासिक महत्व अत्यंत गहरा है। इन्हीं शासकों के प्रयासों के परिणामस्वरूप पल्लव वंश को एक मजबूत आधार प्राप्त हुआ। आगे चलकर सिंहवर्मन के पुत्र सिंहविष्णु के समय पल्लव सत्ता पूर्णतः स्वतंत्र और विस्तारशील बनी। इस प्रकार प्रारंभिक पल्लव शासकों का काल पल्लव इतिहास की वह नींव है, जिस पर पूरे राजवंश का वैभव खड़ा हुआ।
4.2 सिंहविष्णु और पल्लव सत्ता की वास्तविक स्थापना
पल्लव वंश के इतिहास में सिंहविष्णु का स्थान विशेष महत्व रखता है, क्योंकि इन्हीं के काल में पल्लव सत्ता पहली बार पूर्णतः स्वतंत्र और सुदृढ़ रूप में स्थापित हुई। प्रारंभिक पल्लव शासक जहाँ सीमित क्षेत्र और सामंती संबंधों में बंधे थे, वहीं सिंहविष्णु ने पल्लवों को एक स्वतंत्र राजवंश के रूप में संगठित किया। इसी कारण अनेक इतिहासकार उन्हें पल्लव वंश का वास्तविक संस्थापक मानते हैं।
सिंहविष्णु का शासनकाल छठी शताब्दी ईस्वी के उत्तरार्ध में माना जाता है। इस समय दक्षिण भारत में चोल, चेर और पांड्य जैसे प्राचीन राजवंश सक्रिय थे। सिंहविष्णु ने इन शक्तियों के साथ संघर्ष करते हुए अपने राज्य का विस्तार किया और पल्लवों की राजनीतिक स्थिति को मजबूत किया। विशेष रूप से चोल शासकों पर विजय प्राप्त कर उन्होंने पल्लव प्रभाव को टोंडईमंडलम क्षेत्र से बाहर तक फैलाया। इससे पल्लव राज्य एक क्षेत्रीय सत्ता से उभरकर प्रभावशाली राजवंश के रूप में स्थापित हुआ।
सिंहविष्णु ने प्रशासनिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण कदम उठाए। उन्होंने कांचीपुरम को अपनी राजधानी के रूप में विकसित किया और उसे एक स्थायी राजनीतिक केंद्र बनाया। कांचीपुरम के माध्यम से आंतरिक क्षेत्रों और समुद्री तटों के बीच संपर्क स्थापित हुआ, जिससे व्यापार और राजस्व में वृद्धि हुई। उनके शासनकाल में भूमि अनुदान व्यवस्था को भी व्यवस्थित रूप दिया गया, जिससे ब्राह्मणों और मंदिर संस्थाओं को संरक्षण मिला।
धार्मिक दृष्टि से सिंहविष्णु वैष्णव धर्म के अनुयायी थे। उन्होंने भगवान विष्णु की उपासना को राजकीय संरक्षण प्रदान किया, जिससे वैष्णव परंपरा को दक्षिण भारत में व्यापक आधार मिला। हालांकि उनका शासन धार्मिक रूप से सहिष्णु था और अन्य परंपराओं को भी स्वतंत्र रूप से फलने-फूलने का अवसर मिला। यह सहिष्णुता आगे चलकर पल्लव समाज की एक स्थायी विशेषता बनी।
सिंहविष्णु के काल में पल्लव सेना का भी संगठनात्मक विकास हुआ। स्थायी सैन्य संरचना और स्थानीय सरदारों का समर्थन प्राप्त कर पल्लव राज्य आंतरिक विद्रोहों और बाहरी आक्रमणों से सुरक्षित रहा। इसी मजबूत नींव पर आगे चलकर महेंद्रवर्मन प्रथम और नरसिंहवर्मन प्रथम जैसे शक्तिशाली शासकों ने पल्लव साम्राज्य को उत्कर्ष तक पहुँचाया।
इस प्रकार सिंहविष्णु का शासनकाल पल्लव इतिहास में एक निर्णायक मोड़ का प्रतिनिधित्व करता है, जहाँ से पल्लव वंश एक स्वतंत्र, संगठित और दीर्घकालिक सत्ता के रूप में उभरता है।
4.3 महेंद्रवर्मन प्रथम – प्रशासन, धर्म और कला
महेंद्रवर्मन प्रथम पल्लव वंश के सबसे बहुआयामी और प्रतिभाशाली शासकों में गिने जाते हैं। वे सिंहविष्णु के पुत्र थे और उनका शासनकाल लगभग छठी शताब्दी के अंत से सातवीं शताब्दी के प्रारंभ तक माना जाता है। महेंद्रवर्मन प्रथम का महत्व केवल राजनीतिक गतिविधियों तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने प्रशासन, धर्म, साहित्य और स्थापत्य कला—सभी क्षेत्रों में गहरी छाप छोड़ी।
प्रशासनिक दृष्टि से महेंद्रवर्मन प्रथम ने अपने पिता द्वारा स्थापित शासन व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ किया। उन्होंने पल्लव राज्य की सीमाओं की रक्षा के लिए सैन्य संगठन को मजबूत किया और स्थानीय शासकों को केंद्रीय सत्ता के अधीन रखा। उनके शासनकाल में पल्लव और चालुक्य वंशों के बीच संघर्ष की शुरुआत हुई, जिसने आगे चलकर दक्षिण भारत की राजनीति को लंबे समय तक प्रभावित किया। यद्यपि उन्हें कुछ युद्धों में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, फिर भी उन्होंने राज्य की एकता बनाए रखी।
धार्मिक जीवन में महेंद्रवर्मन प्रथम का एक महत्वपूर्ण परिवर्तन देखा जाता है। प्रारंभिक जीवन में वे जैन धर्म से प्रभावित थे, किंतु बाद में संत अप्पर के प्रभाव में आकर उन्होंने शैव धर्म को अपनाया। इस परिवर्तन का प्रभाव उनके धार्मिक संरक्षण और स्थापत्य कार्यों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। उन्होंने शैव परंपरा को राजकीय समर्थन दिया, जिससे दक्षिण भारत में भक्ति आंदोलन को नया आयाम मिला।
कला और स्थापत्य के क्षेत्र में महेंद्रवर्मन प्रथम का योगदान अत्यंत उल्लेखनीय है। उन्होंने दक्षिण भारत में शैलकृत वास्तुकला की परंपरा की नींव रखी। मंडगपट्टु का प्रसिद्ध शिलालेख इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने लकड़ी, ईंट और धातु के स्थान पर पत्थर को स्थायी निर्माण सामग्री के रूप में अपनाने का आग्रह किया। उनके शासनकाल में अनेक गुफा मंदिरों का निर्माण हुआ, जो पल्लव स्थापत्य की प्रारंभिक अवस्था को दर्शाते हैं।
साहित्यिक क्षेत्र में भी महेंद्रवर्मन प्रथम सक्रिय थे। उन्होंने मतविलास प्रहसन नामक हास्य नाटक की रचना की, जो उस समय के धार्मिक आडंबरों और सामाजिक प्रवृत्तियों पर व्यंग्य करता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि वे केवल एक शासक ही नहीं, बल्कि एक संवेदनशील और बौद्धिक व्यक्तित्व भी थे।
इस प्रकार महेंद्रवर्मन प्रथम का शासनकाल पल्लव इतिहास में संक्रमणकालीन महत्व रखता है, जहाँ राजनीतिक संघर्षों के साथ-साथ धार्मिक परिवर्तन और कलात्मक नवाचार समान रूप से विकसित हुए।
4.4 नरसिंहवर्मन प्रथम (महामल्ल) – पल्लव शक्ति का उत्कर्ष
नरसिंहवर्मन प्रथम, जिन्हें महामल्ल के नाम से भी जाना जाता है, पल्लव वंश के सबसे शक्तिशाली और प्रतिष्ठित शासकों में गिने जाते हैं। उनका शासनकाल सातवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य में माना जाता है और इसी काल में पल्लव साम्राज्य अपनी राजनीतिक, सैन्य और सांस्कृतिक शक्ति के चरम शिखर पर पहुँचा। महेंद्रवर्मन प्रथम के बाद सिंहासन पर आकर उन्होंने पल्लव राज्य को न केवल सुदृढ़ किया, बल्कि उसे दक्षिण भारत की प्रमुख शक्ति बना दिया।
राजनीतिक दृष्टि से नरसिंहवर्मन प्रथम का सबसे महत्वपूर्ण कार्य चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय पर विजय प्राप्त करना था। महेंद्रवर्मन प्रथम को पहले पुलकेशिन से पराजय का सामना करना पड़ा था, जिसे नरसिंहवर्मन ने निर्णायक रूप से समाप्त किया। उन्होंने चालुक्य राजधानी वातापी पर आक्रमण कर उसे जीत लिया और इसी उपलब्धि के कारण उन्हें “वातापीकोंड” अर्थात वातापी का विजेता कहा गया। इस विजय ने पल्लवों की प्रतिष्ठा को अत्यंत बढ़ा दिया और चालुक्य शक्ति को गंभीर आघात पहुँचाया।
नरसिंहवर्मन प्रथम के शासनकाल में पल्लव साम्राज्य का विस्तार हुआ और आंतरिक स्थिरता बनी रही। उन्होंने कुशल प्रशासन और संगठित सैन्य शक्ति के माध्यम से अपने राज्य की सीमाओं की रक्षा की। उनकी राजधानी कांचीपुरम राजनीतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बनी रही, जबकि समुद्री तट पर स्थित महाबलीपुरम को एक महत्वपूर्ण नगर के रूप में विकसित किया गया।
कला और स्थापत्य के क्षेत्र में नरसिंहवर्मन प्रथम का योगदान अमर है। उन्होंने महाबलीपुरम को एक प्रमुख सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित किया। यहाँ के रथ मंदिर, गुफा मंदिर और विशाल शिल्प-रिलीफ, जैसे “गंगा अवतरण” दृश्य, पल्लव कला की उत्कृष्टता को दर्शाते हैं। इन कृतियों में धार्मिक विषयों के साथ-साथ गतिशीलता और भावाभिव्यक्ति का सुंदर संयोजन देखने को मिलता है।
नरसिंहवर्मन प्रथम के काल में चीन के साथ सांस्कृतिक संपर्कों के भी संकेत मिलते हैं। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने उनके शासनकाल में कांचीपुरम की यात्रा की थी और अपने विवरणों में इस काल को समृद्ध और सुव्यवस्थित बताया है। उन्होंने नरसिंहवर्मन के शासन की तुलना “हीरे के समान मूल्यवान” काल से की।
इस प्रकार नरसिंहवर्मन प्रथम का शासनकाल पल्लव इतिहास का स्वर्ण युग माना जाता है, जहाँ राजनीतिक विजय, सांस्कृतिक उत्कर्ष और अंतरराष्ट्रीय संपर्क एक साथ विकसित हुए।
4.5 उत्तरकालीन पल्लव शासक (महेंद्रवर्मन द्वितीय से परमेश्वरवर्मन द्वितीय)
नरसिंहवर्मन प्रथम के पश्चात पल्लव वंश में ऐसे शासक आए जिनका शासनकाल अपेक्षाकृत छोटा रहा, किंतु उन्होंने राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने और सांस्कृतिक परंपराओं को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस काल को पल्लव इतिहास का उत्तरकालीन चरण कहा जाता है, जिसमें सत्ता संघर्षों के बावजूद पल्लव प्रशासन और कला निरंतर विकसित होती रही।
नरसिंहवर्मन प्रथम के पुत्र महेंद्रवर्मन द्वितीय सिंहासन पर बैठे, किंतु उनका शासनकाल बहुत अल्पकालिक रहा। राजनीतिक रूप से यह काल अशांत था, क्योंकि चालुक्य वंश के साथ संघर्ष पुनः तीव्र हो गया। महेंद्रवर्मन द्वितीय की मृत्यु के साथ ही पल्लव सत्ता को गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ा, जिससे स्पष्ट होता है कि इस समय पल्लव साम्राज्य आंतरिक और बाह्य दोनों दबावों से जूझ रहा था।
इसके पश्चात परमेश्वरवर्मन प्रथम सत्ता में आए। वे एक शक्तिशाली और युद्धकुशल शासक थे, जिन्होंने चालुक्य आक्रमणों का डटकर सामना किया। उन्होंने अपनी विजयों के उपलक्ष्य में अनेक उपाधियाँ धारण कीं और शैव धर्म के समर्थक के रूप में प्रसिद्ध हुए। उनके काल में महाबलीपुरम में गणेश मंदिर जैसे धार्मिक निर्माण कार्य हुए, जो पल्लव स्थापत्य परंपरा की निरंतरता को दर्शाते हैं।
परमेश्वरवर्मन प्रथम के बाद नरसिंहवर्मन द्वितीय, जिन्हें राजसिंह के नाम से भी जाना जाता है, पल्लव सिंहासन पर बैठे। उनका शासनकाल अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण माना जाता है। इस काल में पल्लव कला और स्थापत्य अपने उच्च स्तर पर पहुँचे। कांचीपुरम का प्रसिद्ध कैलासनाथ मंदिर और महाबलीपुरम का शोर मंदिर इसी काल की देन हैं। इन मंदिरों में संरचनात्मक पत्थर स्थापत्य की परिपक्व शैली दिखाई देती है, जो आगे चलकर द्रविड़ मंदिर शैली का आधार बनी।
नरसिंहवर्मन द्वितीय के बाद परमेश्वरवर्मन द्वितीय सत्ता में आए। उनका शासनकाल अल्पकालिक और अस्थिर रहा। ऐसा माना जाता है कि उनकी मृत्यु के बाद पल्लव वंश की यह शाखा समाप्त हो गई। इससे पल्लव राज्य में उत्तराधिकार संकट उत्पन्न हुआ और सत्ता दूसरी शाखा के हाथों में चली गई।
इस प्रकार उत्तरकालीन पल्लव शासकों का यह चरण राजनीतिक संघर्षों के बावजूद सांस्कृतिक उत्कर्ष का काल रहा। यद्यपि इस समय पल्लव सत्ता धीरे-धीरे कमजोर होने लगी, फिर भी उनकी स्थापत्य और धार्मिक विरासत दक्षिण भारतीय इतिहास में स्थायी स्थान रखती है।
5. भीमवर्मन की शाखा और नंदीवर्मन द्वितीय
परमेश्वरवर्मन द्वितीय की मृत्यु के साथ ही पल्लव वंश की मुख्य शाखा समाप्त हो गई, जिससे पल्लव साम्राज्य में गंभीर उत्तराधिकार संकट उत्पन्न हुआ। इस संकट के समय पल्लव सत्ता को बनाए रखने की जिम्मेदारी वंश की दूसरी शाखा पर आ गई, जिसे भीमवर्मन की शाखा कहा जाता है। इसी शाखा से नंदीवर्मन द्वितीय का उदय हुआ, जिनके शासनकाल ने पल्लव इतिहास को एक नई दिशा प्रदान की।
नंदीवर्मन द्वितीय का चयन पल्लव कुलीनों और प्रशासनिक वर्ग की सहमति से किया गया था। वे हरिण्यवर्मन के पुत्र थे और मूल रूप से पल्लव वंश की दूसरी शाखा से संबंधित थे। इस प्रकार उनका राज्यारोहण केवल वंशानुगत न होकर राजनीतिक आवश्यकता और सामूहिक सहमति का परिणाम था। उन्होंने सत्ता संभालते समय एक कमजोर और अस्थिर साम्राज्य विरासत में पाया, जिसे सुदृढ़ करना उनके शासन का प्रमुख उद्देश्य बना।
नंदीवर्मन द्वितीय के काल में पल्लवों को राष्ट्रकूट शासकों से गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ा। राष्ट्रकूट शासक दंतिदुर्ग के साथ उनका संघर्ष प्रसिद्ध है, जिसमें प्रारंभिक चरण में पल्लवों को पराजय का सामना करना पड़ा। किंतु बाद में दोनों पक्षों के बीच एक वैवाहिक संधि हुई, जिसके अंतर्गत दंतिदुर्ग की पुत्री का विवाह नंदीवर्मन द्वितीय से किया गया। इस वैवाहिक गठबंधन ने पल्लव राज्य को राजनीतिक स्थिरता प्रदान की और बाहरी आक्रमणों से कुछ समय के लिए सुरक्षा सुनिश्चित की।
धार्मिक दृष्टि से नंदीवर्मन द्वितीय वैष्णव परंपरा के अनुयायी थे। उन्होंने भगवान विष्णु की उपासना को संरक्षण दिया और वैष्णव मंदिरों के निर्माण को प्रोत्साहित किया। कांचीपुरम का प्रसिद्ध मुक्तेश्वर मंदिर उनके काल की महत्वपूर्ण धार्मिक उपलब्धि माना जाता है। उनके शासन में धार्मिक सहिष्णुता बनी रही और शैव तथा अन्य परंपराओं को भी स्वतंत्र रूप से विकसित होने का अवसर मिला।
प्रशासनिक रूप से नंदीवर्मन द्वितीय ने पल्लव शासन व्यवस्था को पुनः संगठित किया। उन्होंने स्थानीय शासकों और सामंतों को नियंत्रित कर केंद्रीय सत्ता को मजबूत किया। यद्यपि उनके बाद पल्लव शक्ति धीरे-धीरे क्षीण होने लगी, फिर भी उनका शासनकाल पल्लव इतिहास में स्थायित्व और पुनर्गठन का प्रतीक माना जाता है।
इस प्रकार भीमवर्मन की शाखा और नंदीवर्मन द्वितीय का काल पल्लव वंश के अस्तित्व को बनाए रखने का अंतिम सशक्त प्रयास था, जिसने इस राजवंश को कुछ और दशकों तक जीवित रखा।
6. पल्लव प्रशासन व्यवस्था

पल्लव वंश की प्रशासनिक व्यवस्था दक्षिण भारत की प्राचीन शासन प्रणालियों में एक विकसित और संगठित प्रणाली मानी जाती है। पल्लवों ने राजतंत्रीय शासन व्यवस्था अपनाई, जिसमें राजा सर्वोच्च सत्ता का केंद्र होता था। राजा को केवल राजनीतिक शासक ही नहीं, बल्कि धर्म और न्याय का संरक्षक भी माना जाता था। इस प्रकार शासन की वैधता धार्मिक और सामाजिक मान्यताओं से जुड़ी हुई थी।
पल्लव प्रशासन का आधार केंद्रीकृत सत्ता और स्थानीय स्वशासन के संतुलन पर टिका हुआ था। राजा के अधीन मंत्रियों और उच्च अधिकारियों की एक परिषद कार्य करती थी, जो राज्य की नीति, राजस्व, सैन्य व्यवस्था और न्यायिक मामलों में सलाह देती थी। इन अधिकारियों का चयन प्रायः कुलीन वर्ग से किया जाता था, जिससे प्रशासन में स्थिरता बनी रहती थी।
प्रांतों को प्रशासनिक इकाइयों में विभाजित किया गया था, जिन्हें विभिन्न नामों से जाना जाता था। प्रत्येक प्रांत के अंतर्गत जिले और गाँव आते थे। गाँव प्रशासन की सबसे महत्वपूर्ण इकाई थे। पल्लव काल में ग्राम सभाओं की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। “सभा”, “उर” और “नगरम्” जैसी संस्थाएँ स्थानीय प्रशासन का संचालन करती थीं। ये संस्थाएँ कर संग्रह, सिंचाई व्यवस्था, भूमि प्रबंधन और धार्मिक गतिविधियों की देखरेख करती थीं। इस व्यवस्था ने ग्रामीण समाज को शासन में भागीदारी का अवसर दिया।
राजस्व व्यवस्था का मुख्य आधार भूमि कर था। कृषि पल्लव अर्थव्यवस्था की रीढ़ थी, इसलिए भूमि का मापन और वर्गीकरण किया जाता था। किसानों से उपज के एक निश्चित भाग को कर के रूप में लिया जाता था। इसके अतिरिक्त व्यापार, शिल्प और बंदरगाहों से भी राजस्व प्राप्त होता था। भूमि अनुदान की परंपरा भी प्रचलित थी, जिसके अंतर्गत ब्राह्मणों और मंदिरों को कर-मुक्त भूमि दी जाती थी।
सैन्य व्यवस्था पल्लव प्रशासन का एक और महत्वपूर्ण अंग थी। स्थायी सेना के साथ-साथ सामंतों की सेनाएँ भी आवश्यकता पड़ने पर सक्रिय की जाती थीं। हाथी, घुड़सवार और पैदल सेना पल्लव सैन्य शक्ति के प्रमुख घटक थे। किलों और रणनीतिक नगरों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाता था।
न्याय व्यवस्था में राजा सर्वोच्च न्यायाधीश होता था, किंतु स्थानीय स्तर पर ग्राम सभाएँ और अधिकारी विवादों का निपटारा करते थे। धर्मशास्त्रों और प्रचलित परंपराओं के आधार पर न्याय दिया जाता था।
इस प्रकार पल्लव प्रशासन व्यवस्था संगठित, लचीली और समाज के विभिन्न वर्गों को साथ लेकर चलने वाली थी, जिसने पल्लव राज्य को लंबे समय तक स्थिर बनाए रखा।
7. पल्लव समाज और धर्म
पल्लव कालीन समाज और धर्म दक्षिण भारत के सांस्कृतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण परिवर्तनकाल का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस समय सामाजिक संरचना, धार्मिक आस्थाएँ और आध्यात्मिक गतिविधियाँ परस्पर गहराई से जुड़ी हुई थीं। पल्लव शासकों ने धर्म को केवल व्यक्तिगत आस्था तक सीमित न रखकर उसे सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विकास का माध्यम बनाया।
पल्लव समाज मुख्यतः वर्ण व्यवस्था पर आधारित था, जिसमें ब्राह्मणों को विशेष सम्मान प्राप्त था। ब्राह्मणों को भूमि अनुदान और धार्मिक संरक्षण प्रदान किया जाता था, जिससे वे शिक्षा, यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठानों का संचालन कर सकें। क्षत्रिय वर्ग शासन और सैन्य गतिविधियों से जुड़ा हुआ था, जबकि वैश्य और शूद्र वर्ग कृषि, व्यापार और शिल्प कार्यों में संलग्न थे। यद्यपि समाज में वर्ग विभाजन था, फिर भी धार्मिक आंदोलनों के माध्यम से सामाजिक समावेशन की प्रक्रिया भी देखने को मिलती है।
धार्मिक दृष्टि से पल्लव काल में शैव और वैष्णव धर्म का विशेष उत्कर्ष हुआ। प्रारंभिक काल में जैन और बौद्ध प्रभाव भी दिखाई देता है, किंतु समय के साथ शैव और वैष्णव परंपराएँ प्रमुख हो गईं। पल्लव शासकों ने दोनों परंपराओं को संरक्षण दिया, जिससे धार्मिक सहिष्णुता बनी रही। महेंद्रवर्मन प्रथम का जैन से शैव धर्म की ओर झुकाव इस परिवर्तन का स्पष्ट उदाहरण है।
इस काल में भक्ति आंदोलन ने समाज को गहराई से प्रभावित किया। नयनार संतों ने शैव भक्ति को लोकप्रिय बनाया, जबकि आलवार संतों ने वैष्णव भक्ति परंपरा को सशक्त किया। इन संतों की रचनाएँ तमिल भाषा में थीं, जिससे धार्मिक विचार आम जनता तक पहुँचे। भक्ति आंदोलन ने जाति और वर्ग की सीमाओं को आंशिक रूप से तोड़ते हुए व्यक्तिगत आस्था और ईश्वर-प्रेम पर बल दिया।
मंदिर पल्लव समाज के धार्मिक और सामाजिक जीवन का केंद्र थे। ये केवल पूजा स्थल ही नहीं, बल्कि शिक्षा, कला और सामाजिक गतिविधियों के भी केंद्र थे। मंदिरों के माध्यम से संगीत, नृत्य और मूर्तिकला का विकास हुआ। धार्मिक उत्सव और अनुष्ठान सामाजिक एकता को मजबूत करते थे।
इस प्रकार पल्लव समाज और धर्म ने दक्षिण भारत में एक ऐसी परंपरा को जन्म दिया, जिसमें आध्यात्मिकता, कला और सामाजिक संरचना का समन्वय स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इस विरासत का प्रभाव आगे चलकर चोल और अन्य दक्षिण भारतीय राजवंशों के काल में भी बना रहा।
8. पल्लव कला एवं वास्तुकला
पल्लव वंश का सबसे स्थायी और प्रभावशाली योगदान उनकी कला एवं वास्तुकला में देखा जाता है। दक्षिण भारतीय स्थापत्य परंपरा को एक नई दिशा देने का श्रेय पल्लवों को जाता है। पल्लव काल में मंदिर निर्माण की जो शैली विकसित हुई, वही आगे चलकर चोल, पांड्य और विजयनगर स्थापत्य का आधार बनी। इस कारण पल्लव कला को द्रविड़ स्थापत्य परंपरा की प्रारंभिक और निर्णायक अवस्था माना जाता है।
पल्लव वास्तुकला की शुरुआत शैलकृत (Rock-Cut) मंदिरों से होती है। महेंद्रवर्मन प्रथम के काल में पहाड़ों को काटकर गुफा मंदिरों का निर्माण किया गया। इन मंदिरों की विशेषता उनकी सादगी, सुदृढ़ संरचना और धार्मिक प्रतीकों की स्पष्ट अभिव्यक्ति है। मंडगपट्टु और मामंडूर जैसे गुफा मंदिर पल्लव स्थापत्य की प्रारंभिक अवस्था के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इन निर्माणों में लकड़ी और ईंट के स्थान पर पत्थर के प्रयोग पर विशेष बल दिया गया।
नरसिंहवर्मन प्रथम के समय पल्लव कला ने एक नया चरण प्राप्त किया। इस काल में महाबलीपुरम को एक प्रमुख कला केंद्र के रूप में विकसित किया गया। यहाँ निर्मित रथ मंदिर एक ही चट्टान को काटकर बनाए गए हैं और प्रत्येक रथ किसी न किसी देवता को समर्पित है। इन रथों में द्रविड़ मंदिर शैली की प्रारंभिक विशेषताएँ स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। महाबलीपुरम की विशाल शिल्प-रचना “गंगा अवतरण” पल्लव मूर्तिकला की श्रेष्ठ कृति मानी जाती है, जिसमें गति, भाव और कथा का सुंदर संयोजन है।
पल्लव स्थापत्य का परिपक्व चरण संरचनात्मक पत्थर मंदिरों के रूप में सामने आता है। नरसिंहवर्मन द्वितीय के काल में निर्मित कांचीपुरम का कैलासनाथ मंदिर इस शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह मंदिर पूर्णतः पत्थरों से निर्मित है और इसमें गर्भगृह, मंडप तथा परिक्रमा पथ जैसी विशेषताएँ स्पष्ट रूप से विकसित दिखाई देती हैं। महाबलीपुरम का शोर मंदिर भी इसी परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है, जो समुद्र तट पर स्थित होने के कारण विशिष्ट महत्व रखता है।
पल्लव मूर्तिकला में देवताओं को सजीव और गतिशील रूप में दर्शाया गया है। शैव और वैष्णव दोनों परंपराओं के देवी-देवताओं की मूर्तियाँ समान रूप से सुंदर और भावपूर्ण हैं। अलंकरण अपेक्षाकृत सरल है, जिससे मूर्ति की अभिव्यक्ति अधिक प्रभावशाली बनती है।
इस प्रकार पल्लव कला एवं वास्तुकला केवल धार्मिक अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं थी, बल्कि यह तकनीकी कौशल, सौंदर्यबोध और सांस्कृतिक दृष्टि का संगठित स्वरूप प्रस्तुत करती है।
9. पल्लव साहित्य, शिक्षा और संस्कृति
पल्लव काल दक्षिण भारत के बौद्धिक और सांस्कृतिक इतिहास में एक समृद्ध चरण के रूप में जाना जाता है। इस काल में साहित्य, शिक्षा और कला ने समानांतर रूप से विकास किया और समाज के बौद्धिक स्तर को ऊँचाई प्रदान की। पल्लव शासकों ने विद्वानों, कवियों और कलाकारों को संरक्षण देकर ज्ञान और संस्कृति के प्रसार को प्रोत्साहित किया।
साहित्यिक क्षेत्र में पल्लव काल की सबसे बड़ी विशेषता संस्कृत और तमिल दोनों भाषाओं का समान संरक्षण था। संस्कृत को राजकीय और शास्त्रीय भाषा का स्थान प्राप्त था, जबकि तमिल लोकभाषा के रूप में साहित्यिक अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनी। अनेक पल्लव अभिलेख द्विभाषी हैं, जिनमें संस्कृत और तमिल दोनों का प्रयोग मिलता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि पल्लव शासन सांस्कृतिक समन्वय को महत्व देता था।
महेंद्रवर्मन प्रथम स्वयं एक विद्वान और साहित्यकार थे। उनकी रचना मतविलास प्रहसन उस समय के धार्मिक आडंबरों और सामाजिक प्रवृत्तियों पर व्यंग्य करती है। यह ग्रंथ न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि उस काल की सामाजिक मानसिकता को समझने का भी एक महत्वपूर्ण स्रोत है। इसके अतिरिक्त अनेक कवि और विद्वान पल्लव दरबार से जुड़े हुए थे, जिन्होंने संस्कृत काव्य और नाट्य परंपरा को समृद्ध किया।
शिक्षा के क्षेत्र में पल्लव काल में कांचीपुरम एक प्रमुख अध्ययन केंद्र के रूप में विकसित हुआ। यहाँ वैदिक शिक्षा, व्याकरण, दर्शन और धर्मशास्त्र का अध्ययन किया जाता था। मंदिर और मठ शिक्षा के प्रमुख केंद्र थे, जहाँ विद्यार्थियों को आवास और अध्ययन की सुविधा प्राप्त होती थी। शिक्षा का उद्देश्य केवल धार्मिक ज्ञान देना नहीं था, बल्कि प्रशासन और समाज के लिए प्रशिक्षित व्यक्तियों का निर्माण करना भी था।
सांस्कृतिक जीवन में संगीत, नृत्य और चित्रकला का विशेष स्थान था। मंदिरों में आयोजित धार्मिक अनुष्ठानों के साथ संगीत और नृत्य की परंपरा जुड़ी हुई थी। भरतनाट्यम जैसी नृत्य शैलियों के प्रारंभिक रूप इसी काल में विकसित होते दिखाई देते हैं। मूर्तियों और भित्ति शिल्पों में नृत्य मुद्राओं का अंकन इस सांस्कृतिक समृद्धि का प्रमाण है।
इस प्रकार पल्लव साहित्य, शिक्षा और संस्कृति ने दक्षिण भारत में एक ऐसी परंपरा को जन्म दिया, जिसमें शास्त्रीय और लोक तत्वों का संतुलित समन्वय दिखाई देता है। यह सांस्कृतिक विरासत आगे चलकर चोल और अन्य दक्षिण भारतीय राजवंशों के सांस्कृतिक विकास का आधार बनी।
10. पल्लव विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय संपर्क
पल्लव वंश की विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय संपर्क दक्षिण भारत के प्राचीन समुद्री इतिहास को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यद्यपि पल्लवों की शक्ति मुख्यतः स्थल-आधारित थी, फिर भी उन्होंने समुद्री व्यापार और विदेशी संबंधों को विशेष महत्व दिया। उनके शासनकाल में दक्षिण भारत केवल एक क्षेत्रीय शक्ति न रहकर व्यापक अंतरराष्ट्रीय संपर्कों वाला क्षेत्र बन गया।
पल्लव राज्य का तटीय भूभाग और बंगाल की खाड़ी के निकट स्थित बंदरगाह उनके विदेशी संपर्कों का आधार थे। महाबलीपुरम पल्लवों का प्रमुख बंदरगाह नगर माना जाता है, जहाँ से दक्षिण-पूर्व एशिया और पूर्वी एशिया के देशों के साथ व्यापारिक संपर्क स्थापित होते थे। इस बंदरगाह के माध्यम से वस्त्र, मसाले, हाथीदांत और कीमती पत्थरों का निर्यात किया जाता था, जबकि विदेशी क्षेत्रों से बहुमूल्य वस्तुएँ और सांस्कृतिक प्रभाव भारत में प्रवेश करते थे।
पल्लवों के अंतरराष्ट्रीय संबंधों में चीन का विशेष स्थान था। नरसिंहवर्मन द्वितीय के शासनकाल में पहली बार पल्लवों ने चीन के सम्राट के दरबार में अपना राजदूत भेजा। इससे दोनों क्षेत्रों के बीच कूटनीतिक और सांस्कृतिक संबंध सुदृढ़ हुए। चीनी स्रोतों में पल्लव राज्य की समृद्धि और व्यवस्थित शासन का उल्लेख मिलता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि पल्लवों की अंतरराष्ट्रीय छवि सकारात्मक थी।
दक्षिण-पूर्व एशिया पर पल्लवों का सांस्कृतिक प्रभाव भी उल्लेखनीय रहा। पल्लव लिपि और स्थापत्य शैली का प्रभाव कंबोडिया, जावा और अन्य द्वीपीय क्षेत्रों में देखा जाता है। वहाँ के मंदिरों और अभिलेखों में पल्लव कालीन कलात्मक विशेषताओं की झलक मिलती है। यह प्रभाव व्यापारियों, भिक्षुओं और कारीगरों के माध्यम से फैला, न कि किसी सैन्य विस्तार के द्वारा।
पल्लव विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि वे आक्रामक उपनिवेशवादी दृष्टिकोण के बजाय सांस्कृतिक आदान-प्रदान पर बल देते थे। उन्होंने धार्मिक विचारों, कला शैलियों और प्रशासनिक अवधारणाओं को साझा किया, जिससे दक्षिण भारतीय संस्कृति का प्रभाव दूर-दराज़ के क्षेत्रों तक पहुँचा।
इस प्रकार पल्लवों के अंतरराष्ट्रीय संपर्कों ने न केवल उनकी आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ किया, बल्कि दक्षिण भारत को प्राचीन विश्व की समुद्री और सांस्कृतिक नेटवर्क का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना दिया। यह संपर्क पल्लव विरासत का एक कम चर्चित किंतु अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू है।
11. पल्लव वंश के पतन के कारण
पल्लव वंश का पतन एक अचानक घटना नहीं था, बल्कि यह एक दीर्घकालिक और क्रमिक प्रक्रिया का परिणाम था। लगभग नौवीं शताब्दी ईस्वी तक आते-आते पल्लव शक्ति कमजोर पड़ने लगी और अंततः उनका स्थान नए उभरते राजवंशों ने ले लिया। इस पतन के पीछे राजनीतिक, सैन्य, प्रशासनिक और आर्थिक—सभी प्रकार के कारण कार्यरत थे।
पल्लव वंश के पतन का एक प्रमुख कारण लगातार होने वाले युद्ध थे। चालुक्य, राष्ट्रकूट और पांड्य शासकों के साथ लंबे समय तक चले संघर्षों ने पल्लव साम्राज्य की सैन्य शक्ति और संसाधनों को क्षीण कर दिया। विशेष रूप से चालुक्यों के साथ संघर्ष, जो महेंद्रवर्मन प्रथम के काल से आरंभ हुआ था, पीढ़ियों तक चलता रहा। इन युद्धों में पल्लवों को कभी विजय मिली, तो कभी पराजय, लेकिन दीर्घकाल में इससे राज्य की स्थिरता प्रभावित हुई।
एक अन्य महत्वपूर्ण कारण उत्तराधिकार संकट था। नरसिंहवर्मन द्वितीय के बाद पल्लव वंश में योग्य और शक्तिशाली शासकों का अभाव दिखाई देता है। परमेश्वरवर्मन द्वितीय की मृत्यु के बाद मुख्य शाखा का अंत हो गया, जिससे सत्ता संघर्ष उत्पन्न हुआ। भीमवर्मन की शाखा से नंदीवर्मन द्वितीय का उदय हुआ, परंतु इस परिवर्तन ने पल्लव सत्ता की निरंतरता को कमजोर कर दिया।
पल्लव प्रशासन व्यवस्था, जो प्रारंभिक काल में सुदृढ़ थी, उत्तरकाल में सामंतवाद के प्रभाव में कमजोर पड़ने लगी। स्थानीय शासक और सामंत धीरे-धीरे अधिक स्वतंत्र होते गए, जिससे केंद्रीय सत्ता का नियंत्रण शिथिल हुआ। राजस्व संग्रह और सैन्य संगठन पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ा।
आर्थिक कारण भी पल्लव पतन में सहायक रहे। निरंतर युद्धों, विशाल मंदिर निर्माण और भूमि अनुदानों के कारण राज्य के संसाधनों पर दबाव बढ़ता गया। कृषि और व्यापार से प्राप्त आय पर्याप्त न रह गई, जिससे राज्य की आर्थिक क्षमता कमजोर हुई।
सबसे निर्णायक कारण चोल शक्ति का उदय था। चोल शासकों ने संगठित प्रशासन, शक्तिशाली सेना और मजबूत नौसैनिक क्षमता के बल पर पल्लव क्षेत्रों पर नियंत्रण स्थापित करना शुरू किया। धीरे-धीरे पल्लव राज्य चोल साम्राज्य में विलीन हो गया।
इस प्रकार पल्लव वंश का पतन आंतरिक दुर्बलताओं और बाहरी शक्तियों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम था। यद्यपि उनका राजनीतिक अस्तित्व समाप्त हो गया, फिर भी उनकी सांस्कृतिक और स्थापत्य विरासत दक्षिण भारतीय इतिहास में स्थायी बनी रही।
12. पल्लव वंश का ऐतिहासिक महत्व और विरासत
पल्लव वंश का ऐतिहासिक महत्व केवल उसके राजनीतिक शासन तक सीमित नहीं है, बल्कि उसकी वास्तविक पहचान उसकी दीर्घकालिक सांस्कृतिक, धार्मिक और स्थापत्य विरासत में निहित है। दक्षिण भारत के इतिहास में पल्लवों ने एक ऐसे संक्रमणकाल का प्रतिनिधित्व किया, जिसमें प्राचीन परंपराएँ संगठित मध्यकालीन संरचनाओं की ओर अग्रसर हुईं।
राजनीतिक दृष्टि से पल्लवों ने दक्षिण भारत में एक स्थिर और संगठित राजसत्ता की अवधारणा को सुदृढ़ किया। उन्होंने प्रशासनिक व्यवस्था, स्थानीय स्वशासन और भूमि अनुदान प्रणाली को सुव्यवस्थित रूप दिया, जिसे बाद के राजवंशों ने अपनाया और विकसित किया। पल्लव शासन ने यह सिद्ध किया कि क्षेत्रीय शक्ति भी दीर्घकाल तक प्रभावी शासन कर सकती है।
पल्लवों का सबसे महत्वपूर्ण योगदान द्रविड़ स्थापत्य शैली के विकास में रहा। शैलकृत गुफा मंदिरों से लेकर पूर्ण संरचनात्मक पत्थर मंदिरों तक की यात्रा पल्लव काल में ही संभव हो सकी। महाबलीपुरम के रथ मंदिर, विशाल शिल्प-रिलीफ और कांचीपुरम का कैलासनाथ मंदिर भारतीय स्थापत्य इतिहास की अमूल्य धरोहर हैं। इन संरचनाओं ने आगे चलकर चोल, पांड्य और विजयनगर स्थापत्य को प्रेरित किया।
धार्मिक क्षेत्र में पल्लवों ने शैव और वैष्णव परंपराओं को समान रूप से संरक्षण दिया। भक्ति आंदोलन को राजकीय समर्थन मिलने से धर्म लोकजीवन के अधिक निकट आया। नयनार और आलवार संतों की परंपरा ने समाज में व्यक्तिगत आस्था, नैतिकता और भक्ति को केंद्र में रखा। इससे दक्षिण भारतीय धार्मिक जीवन में स्थायित्व और गहराई आई।
सांस्कृतिक रूप से पल्लव काल ने संस्कृत और तमिल दोनों भाषाओं को समृद्ध किया। साहित्य, संगीत, नृत्य और मूर्तिकला के क्षेत्र में जो परंपराएँ विकसित हुईं, उनका प्रभाव आज भी देखा जा सकता है। कांचीपुरम जैसे नगर विद्या और संस्कृति के केंद्र बने, जहाँ से ज्ञान और कला का प्रसार हुआ।
अंतरराष्ट्रीय दृष्टि से भी पल्लव विरासत महत्वपूर्ण है। दक्षिण-पूर्व एशिया में पल्लव लिपि, कला और स्थापत्य का प्रभाव भारतीय सांस्कृतिक विस्तार का एक प्रमुख उदाहरण है। यह प्रभाव शांतिपूर्ण सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से फैला, जो पल्लव दृष्टिकोण की परिपक्वता को दर्शाता है।
इस प्रकार पल्लव वंश का ऐतिहासिक महत्व उसके राजनीतिक उत्थान-पतन से कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विरासत आज भी दक्षिण भारतीय संस्कृति, मंदिर स्थापत्य और धार्मिक परंपराओं में जीवित है, जो उन्हें भारतीय इतिहास का एक अविस्मरणीय अध्याय बनाती है।
13. निष्कर्ष (Conclusion)
पल्लव वंश का इतिहास दक्षिण भारत की प्राचीन सभ्यता के विकास की एक सशक्त और प्रेरक कथा प्रस्तुत करता है। चौथी शताब्दी ईस्वी से लेकर नौवीं शताब्दी ईस्वी तक पल्लवों ने न केवल एक दीर्घकालिक शासन स्थापित किया, बल्कि राजनीतिक संगठन, प्रशासनिक व्यवस्था, धर्म और कला के क्षेत्र में भी स्थायी योगदान दिया। उनका शासनकाल प्राचीन और मध्यकालीन भारत के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु के रूप में देखा जा सकता है।
राजनीतिक रूप से पल्लवों ने दक्षिण भारत में एक संगठित और स्थिर सत्ता की नींव रखी। सिंहविष्णु द्वारा स्थापित स्वतंत्र सत्ता को महेंद्रवर्मन प्रथम और नरसिंहवर्मन प्रथम जैसे शासकों ने सुदृढ़ किया। विशेष रूप से नरसिंहवर्मन प्रथम के काल में पल्लव साम्राज्य अपने चरम उत्कर्ष पर पहुँचा। यद्यपि उत्तरकाल में आंतरिक दुर्बलताओं और बाहरी आक्रमणों के कारण पल्लव शक्ति क्षीण होती गई, फिर भी उनका शासन कई शताब्दियों तक प्रभावी बना रहा।
पल्लवों की सबसे स्थायी पहचान उनकी कला और वास्तुकला में निहित है। शैलकृत गुफा मंदिरों से लेकर भव्य संरचनात्मक मंदिरों तक की परंपरा ने दक्षिण भारतीय स्थापत्य को एक स्पष्ट दिशा प्रदान की। महाबलीपुरम और कांचीपुरम के मंदिर आज भी पल्लव सौंदर्यबोध, तकनीकी कौशल और धार्मिक आस्था के जीवंत प्रतीक हैं।
धार्मिक और सामाजिक दृष्टि से पल्लव काल ने भक्ति परंपरा को व्यापक आधार दिया। शैव और वैष्णव दोनों संप्रदायों को संरक्षण मिलने से धार्मिक सहिष्णुता और सांस्कृतिक संतुलन बना रहा। नयनार और आलवार संतों की शिक्षाएँ समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुँचीं और धार्मिक जीवन को अधिक लोकाभिमुख बनाया।
साहित्य, शिक्षा और अंतरराष्ट्रीय संपर्कों के माध्यम से पल्लवों ने दक्षिण भारत को एक व्यापक सांस्कृतिक परिदृश्य से जोड़ा। उनकी विरासत चोल और अन्य उत्तरवर्ती राजवंशों के विकास में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
अंततः, पल्लव वंश का इतिहास यह दर्शाता है कि किसी राजवंश की वास्तविक महानता केवल उसकी राजनीतिक शक्ति में नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक विरासत और दीर्घकालिक प्रभाव में निहित होती है। पल्लवों द्वारा निर्मित यह विरासत आज भी भारतीय इतिहास और संस्कृति को समृद्ध करती है।