ईस्ट इंडिया कंपनी की शुरुआत व्यापारिक संस्था के रूप में हुई थी, लेकिन लगभग ढाई शताब्दियों के भीतर वही संस्था भारत के बड़े हिस्से में राजनीतिक और राजस्व-सत्ता का केंद्र बन गई। कंपनी को 31 दिसंबर 1600 को इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने शाही चार्टर दिया। इसका आधिकारिक नाम “गवर्नर एंड कंपनी ऑफ मर्चेंट्स ऑफ लंदन ट्रेडिंग इन्टू द ईस्ट इंडीज” था।
भारत में कंपनी की कहानी केवल व्यापार की नहीं है। सूरत की फैक्ट्री, मद्रास, बंबई और कलकत्ता जैसे केंद्र, प्लासी और बक्सर के युद्ध, बंगाल की दीवानी, मैसूर और मराठा युद्ध, सहायक संधियाँ, भूमि-राजस्व व्यवस्था और 1857 का विद्रोह मिलकर उस प्रक्रिया को समझाते हैं जिसके माध्यम से एक निजी व्यापारिक कंपनी औपनिवेशिक राज्य जैसी शक्ति बन गई।
ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना कब हुई?
पुराने लेख में कंपनी की स्थापना 1599 लिखी थी। वास्तव में कुछ अंग्रेज व्यापारियों ने पूर्वी देशों से व्यापार के लिए संगठन बनाने की तैयारी 1599 में शुरू की थी, लेकिन कंपनी को कानूनी पहचान और शाही अधिकार 31 दिसंबर 1600 को मिले। इसलिए कंपनी की आधिकारिक स्थापना 1600 मानी जाती है।
ब्रिटिश लाइब्रेरी के अभिलेख में एलिजाबेथ प्रथम द्वारा जारी वही चार्टर सुरक्षित है, जिसने कंपनी को पूर्वी देशों से व्यापार करने के लिए एक निगमित संस्था बनाया।
कंपनी का मूल उद्देश्य क्या था?
शुरुआत में कंपनी का उद्देश्य भारत पर शासन करना नहीं था। वह मसाले, कपड़ा, रेशम, नील, काली मिर्च, नमकशोरा और अन्य मूल्यवान वस्तुओं का व्यापार करना चाहती थी।
यूरोप में एशियाई वस्तुओं की भारी मांग थी। पुर्तगाली और डच व्यापारी पहले से समुद्री व्यापार में सक्रिय थे, इसलिए अंग्रेज कंपनी को भी सुरक्षित बंदरगाह, स्थानीय शासकों की अनुमति और व्यापारिक गोदामों की जरूरत थी।
भारत में कंपनी का पहला चरण
कंपनी के जहाज 17वीं सदी के शुरुआती वर्षों में हिंद महासागर और भारतीय तटों तक आने लगे। भारत में स्थायी व्यापारिक आधार बनाना आसान नहीं था, क्योंकि मुगल साम्राज्य शक्तिशाली था और पुर्तगाली समुद्री व्यापार पर मजबूत पकड़ रखते थे।
इस शुरुआती दौर में कंपनी को स्थानीय और मुगल अधिकारियों से अनुमति लेनी पड़ती थी। वह स्वयं अभी क्षेत्रीय राजनीतिक शक्ति नहीं थी।
क्या थॉमस स्टीफंस 1603 में अकबर के दरबार गए थे?
पुराने लेख में लिखा था कि 1603 में थॉमस स्टीफंस को अकबर के दरबार भेजा गया और फारसी न जानने के कारण वे असफल हुए। यह विवरण मानक ईस्ट इंडिया कंपनी इतिहास का स्थापित तथ्य नहीं है।
थॉमस स्टीफंस एक अंग्रेज जेसुइट मिशनरी थे जो 16वीं सदी के अंत में भारत आए थे, लेकिन उन्हें कंपनी के 1603 व्यापारिक दूत के रूप में प्रस्तुत करना गलत है। कंपनी-मुगल संबंधों में विलियम हॉकिन्स और सर थॉमस रो अधिक स्पष्ट ऐतिहासिक महत्व रखते हैं।
विलियम हॉकिन्स और जहांगीर
कैप्टन विलियम हॉकिन्स 1608 में हेक्टर नामक जहाज से सूरत पहुँचे और बाद में मुगल सम्राट जहांगीर के दरबार में गए। वे तुर्की और कुछ पूर्वी भाषाओं से परिचित थे और दरबार में कई वर्षों तक रहे।
हॉकिन्स ने व्यापारिक अधिकार प्राप्त करने की कोशिश की, लेकिन पुर्तगाली विरोध और मुगल दरबार की राजनीति के कारण कंपनी को तुरंत स्थायी व्यापक अधिकार नहीं मिले।
मुगल साम्राज्य की पृष्ठभूमि समझने के लिए मुगल साम्राज्य का इतिहास पढ़ सकते हैं।
सूरत की फैक्ट्री कैसे स्थापित हुई?
1612 में स्वाली की समुद्री लड़ाई में अंग्रेज जहाजों ने पुर्तगाली बेड़े का सामना किया। इस सफलता के बाद मुगल अधिकारियों को अंग्रेजों की समुद्री क्षमता का महत्व समझ आया।
1613 के आसपास सूरत में ईस्ट इंडिया कंपनी को स्थायी व्यापारिक केंद्र स्थापित करने की अनुमति मिली। यह पश्चिमी भारत में कंपनी के प्रमुख प्रारंभिक आधारों में से एक बना।
सर थॉमस रो की भूमिका
1615 में इंग्लैंड के राजा जेम्स प्रथम ने सर थॉमस रो को मुगल सम्राट जहांगीर के दरबार में राजदूत बनाकर भेजा। वे कई वर्षों तक दरबार में रहे और कंपनी के लिए अधिक स्थिर व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त करने की कोशिश की।
रो ने कोई एक “पूरे भारत का व्यापार अधिकार” नहीं लिया, बल्कि अलग-अलग स्थानों पर व्यापारिक सुरक्षा और सुविधाओं के लिए मुगल दरबार से संबंध मजबूत किए।
मसुलीपट्टनम और पूर्वी तट
कंपनी ने दक्षिण-पूर्वी तट पर मसुलीपट्टनम जैसे बंदरगाहों में भी व्यापार बढ़ाया। 17वीं सदी के शुरुआती दशकों में यह कपड़ा व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र था।
दक्षिण भारत के सूती वस्त्र यूरोप और एशिया के दूसरे बाजारों में अत्यधिक लोकप्रिय थे। कंपनी धीरे-धीरे समुद्री व्यापार का विस्तृत जाल बनाने लगी।
मद्रास और फोर्ट सेंट जॉर्ज
1639 में कंपनी के प्रतिनिधियों ने दक्षिण-पूर्वी तट पर भूमि प्राप्त की, जहाँ बाद में मद्रास का अंग्रेज व्यापारिक केंद्र विकसित हुआ। लगभग 1640 में फोर्ट सेंट जॉर्ज का निर्माण शुरू हुआ।
यह स्थान कंपनी के दक्षिण भारतीय प्रशासन और व्यापार का प्रमुख केंद्र बन गया। आगे चलकर मद्रास अंग्रेजी शासन की तीन प्रमुख प्रेसिडेंसियों में से एक बना।
बंबई कंपनी को कैसे मिली?
1661 में पुर्तगाल की राजकुमारी कैथरीन ऑफ ब्रगांज़ा का विवाह इंग्लैंड के राजा चार्ल्स द्वितीय से हुआ। विवाह समझौते के तहत बंबई द्वीपसमूह अंग्रेजी राजसत्ता को मिला।
1668 में राजसत्ता ने बंबई को बहुत कम वार्षिक किराए पर ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया। इसके बाद कंपनी ने इसे पश्चिमी तट के प्रमुख बंदरगाह और प्रशासनिक केंद्र के रूप में विकसित किया।
बंगाल में कंपनी का प्रवेश
बंगाल 17वीं और 18वीं सदी में विश्व के सबसे समृद्ध वस्त्र और कृषि क्षेत्रों में था। कंपनी ने हुगली, कासिमबाजार और दूसरे स्थानों पर व्यापारिक केंद्र बनाए।
बंगाल का महीन कपड़ा, रेशम और नमकशोरा यूरोपीय व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण थे। यही आर्थिक आकर्षण आगे कंपनी की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से जुड़ गया।
कलकत्ता का विकास
1690 के आसपास कंपनी ने सुतानुती क्षेत्र में अपना आधार मजबूत किया। बाद में सुतानुती, गोविंदपुर और कालिकाता नामक बस्तियों से मिलकर कलकत्ता का औपनिवेशिक नगर विकसित हुआ।
पुराने लेख में “1699 में जॉब चार्नॉक ने कलकत्ता शहर की स्थापना की” लिखा था। आधुनिक इतिहास इसे बहुत सरल कथन मानता है। शहर का विकास पहले से बसे गाँवों, स्थानीय जमींदारों, व्यापारियों और कंपनी की गतिविधियों के संयुक्त परिणाम के रूप में हुआ। इसलिए किसी एक व्यक्ति को “एकमात्र संस्थापक” कहना उचित नहीं है।
फोर्ट विलियम
कंपनी ने कलकत्ता क्षेत्र में अपनी सुरक्षा के लिए किलेबंदी की और फोर्ट विलियम विकसित किया। बंगाल में कंपनी की बढ़ती सैन्य और व्यापारिक शक्ति का यह प्रतीक बन गया।
किलेबंदी को लेकर बंगाल के नवाब और कंपनी के बीच तनाव आगे 1756 के संकट में एक कारण बना।
1717 का फर्रुखसियर फरमान
मुगल सम्राट फर्रुखसियर ने 1717 में कंपनी को बंगाल में महत्वपूर्ण व्यापारिक सुविधाएँ देने वाला फरमान जारी किया। कंपनी ने बाद में इन अधिकारों की व्यापक व्याख्या की और स्थानीय अधिकारियों के साथ विवाद बढ़ते गए।
राजस्व छूट और दस्तक के दुरुपयोग का प्रश्न बंगाल की राजनीति में गंभीर तनाव का कारण बना।
कंपनी व्यापार से राजनीति की ओर क्यों बढ़ी?
18वीं सदी में मुगल साम्राज्य की केंद्रीय शक्ति कमजोर हुई और अनेक क्षेत्रीय राज्य मजबूत हुए। इसी समय यूरोपीय कंपनियों के बीच युद्ध और प्रतिस्पर्धा बढ़ी।
कंपनी ने अपने व्यापारिक केंद्रों की सुरक्षा के लिए निजी सेना बढ़ाई। धीरे-धीरे वह स्थानीय उत्तराधिकार विवादों, संधियों और युद्धों में सक्रिय होने लगी।
1756 में सिराजुद्दौला और कलकत्ता
1756 में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला ने कंपनी की बढ़ती किलेबंदी और स्वतंत्र व्यवहार का विरोध किया। उन्होंने कलकत्ता पर आक्रमण किया और फोर्ट विलियम पर कब्जा कर लिया।
कंपनी के अधिकारी दक्षिण की ओर हटे और बाद में रॉबर्ट क्लाइव तथा एडमिरल वॉटसन के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना ने कलकत्ता वापस लिया।
प्लासी का युद्ध — 23 जून 1757
प्लासी का युद्ध सिराजुद्दौला की सेना और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुआ। रॉबर्ट क्लाइव ने कंपनी की सेना का नेतृत्व किया।
युद्ध केवल सैन्य शक्ति से नहीं जीता गया। नवाब के सेनापति मीर जाफर और अन्य दरबारी षड्यंत्र में शामिल थे और निर्णायक समय पर सेना का बड़ा हिस्सा निष्क्रिय रहा। सिराजुद्दौला पराजित हुए और बाद में मारे गए।
कंपनी ने मीर जाफर को बंगाल का नवाब बनाया। यहीं से बंगाल की राजनीति पर कंपनी का प्रभाव बहुत बढ़ गया।
क्या प्लासी से ही कंपनी पूरे भारत की शासक बन गई?
नहीं। प्लासी बहुत महत्वपूर्ण मोड़ था, लेकिन कंपनी तुरंत पूरे भारत की शासक नहीं बनी। बंगाल में भी उसे आगे मीर कासिम, अवध और मुगल सम्राट से संघर्ष करना पड़ा। पूरे उपमहाद्वीप पर प्रभुत्व स्थापित करने की प्रक्रिया लगभग एक सदी तक चली।
मीर कासिम और कंपनी का संघर्ष
मीर जाफर के बाद कंपनी ने मीर कासिम को बंगाल का नवाब बनाया। लेकिन मीर कासिम ने प्रशासन और सेना मजबूत करने की कोशिश की तथा कंपनी के व्यापारिक विशेषाधिकारों को चुनौती दी।
तनाव युद्ध में बदला और मीर कासिम ने अवध के नवाब शुजाउद्दौला तथा मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय के साथ गठबंधन किया।
बक्सर का युद्ध — 1764
बक्सर के युद्ध में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना का सामना मीर कासिम, शुजाउद्दौला और शाह आलम द्वितीय से जुड़े संयुक्त पक्ष से हुआ। कंपनी की सेना का नेतृत्व हेक्टर मुनरो ने किया।
कंपनी की जीत ने उसे बंगाल से आगे उत्तर भारत की राजनीति में भी अत्यंत शक्तिशाली बना दिया। कई इतिहासकार बक्सर को प्लासी से भी अधिक निर्णायक मानते हैं, क्योंकि इसके बाद कंपनी को राजस्व और राजनीतिक वैधता के बड़े अधिकार मिले।
1765 में दीवानी अधिकार
1765 में इलाहाबाद समझौते के बाद मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय ने कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी अर्थात राजस्व वसूली और नागरिक प्रशासन से जुड़े अधिकार प्रदान किए।
यहीं से कंपनी केवल व्यापारिक लाभ कमाने वाली संस्था नहीं रही; अब वह विशाल क्षेत्र से कर वसूलने वाली राजनीतिक शक्ति बन गई।
इलाहाबाद की संधि के बारे में पुरानी गलती
पुराने लेख में लिखा था कि “दूसरी इलाहाबाद संधि से कंपनी को पूरे भारत में कर-मुक्त व्यापार का अधिकार मिला।” यह गलत है। 1765 के समझौतों ने शाह आलम द्वितीय, शुजाउद्दौला और कंपनी के बीच युद्धोत्तर राजनीतिक संबंध तथा बंगाल की दीवानी व्यवस्था तय की।
बंगाल में द्वैध शासन
दीवानी मिलने के बाद कुछ समय तक बंगाल में ऐसी व्यवस्था बनी जिसमें राजस्व शक्ति कंपनी के पास थी, जबकि नाममात्र का निजामत और स्थानीय प्रशासन नवाब के नाम से चलता रहा। इससे जिम्मेदारी अस्पष्ट हुई और कंपनी राजस्व तो लेती थी, लेकिन जनता के कल्याण और प्रशासन की जवाबदेही सीमित थी।
1773 का रेगुलेटिंग एक्ट
कंपनी की बढ़ती राजनीतिक शक्ति और वित्तीय संकट ने ब्रिटिश संसद को हस्तक्षेप के लिए मजबूर किया। 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट ने कंपनी के शासन पर सरकारी निगरानी बढ़ाई और बंगाल के गवर्नर को गवर्नर-जनरल का व्यापक पद दिया।
वॉरेन हेस्टिंग्स पहले गवर्नर-जनरल ऑफ बंगाल बने। यह कदम दिखाता है कि निजी कंपनी का भारतीय शासन अब ब्रिटिश राज्य के लिए भी बड़ा राजनीतिक प्रश्न बन चुका था।
1784 का पिट्स इंडिया एक्ट
1784 में ब्रिटिश सरकार ने नियंत्रण बोर्ड के माध्यम से कंपनी के राजनीतिक मामलों पर अधिक सीधा नियंत्रण स्थापित किया। अब कंपनी औपचारिक रूप से व्यापारिक संस्था बनी रही, लेकिन भारत में उसके राजनीतिक निर्णय ब्रिटिश सरकार की निगरानी में अधिक आ गए।
मैसूर के साथ युद्ध
दक्षिण भारत में कंपनी को हैदर अली और टीपू सुल्तान के नेतृत्व वाले मैसूर से गंभीर चुनौती मिली। चार आंग्ल-मैसूर युद्धों ने दक्षिण भारतीय राजनीति को बदल दिया।
1799 में श्रीरंगपट्टनम की लड़ाई में टीपू सुल्तान मारे गए और मैसूर की शक्ति बहुत कमजोर हो गई। इसके बाद दक्षिण में कंपनी का प्रभुत्व बढ़ा।
मराठों के साथ संघर्ष
मराठा शक्ति 18वीं सदी में भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्तियों में थी। कंपनी और मराठों के बीच तीन बड़े आंग्ल-मराठा युद्ध हुए।
1818 में तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध के बाद पेशवा बाजीराव द्वितीय की शक्ति समाप्त हुई और कंपनी ने पश्चिम तथा मध्य भारत के बड़े हिस्सों पर प्रभाव स्थापित किया।
मराठा इतिहास के लिए मराठा साम्राज्य और पेशवा बाजीराव के लेख पढ़ सकते हैं।
सहायक संधि की नीति
गवर्नर-जनरल लॉर्ड वेलेजली ने कई भारतीय राज्यों के साथ ऐसी संधियाँ कराईं जिनमें राज्य को कंपनी की सेना अपने क्षेत्र में रखने और उसका खर्च देने की शर्त माननी पड़ती थी। बदले में कंपनी बाहरी सुरक्षा का दावा करती थी। इससे भारतीय राज्यों की स्वतंत्र विदेश नीति और सैन्य स्वायत्तता कमजोर होती गई।
लैप्स की नीति
लॉर्ड डलहौजी के समय व्यपगत सिद्धांत या “लैप्स की नीति” के तहत कुछ ऐसे रियासती राज्यों को कंपनी में मिला लिया गया जहाँ शासक का जैविक पुरुष उत्तराधिकारी नहीं था और दत्तक उत्तराधिकारी को कंपनी मान्यता नहीं देती थी।
सतारा, झाँसी और नागपुर जैसे राज्यों पर इस नीति का प्रभाव पड़ा। यह भारतीय राजाओं और अभिजात वर्ग में असंतोष का बड़ा कारण बनी।
1813 और 1833 के चार्टर अधिनियम
1813 के चार्टर अधिनियम ने भारत के साथ कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार का बड़ा हिस्सा समाप्त कर दिया, हालांकि चीन और चाय व्यापार से जुड़े कुछ विशेष अधिकार कुछ समय और रहे।
1833 के चार्टर अधिनियम के बाद कंपनी का व्यापारिक कार्य लगभग समाप्त हो गया और वह मुख्य रूप से भारत का प्रशासन चलाने वाली संस्था बन गई।
कंपनी की भूमि-राजस्व नीतियाँ
कंपनी ने अलग क्षेत्रों में अलग भूमि-राजस्व प्रणालियाँ लागू कीं। बंगाल में स्थायी बंदोबस्त, दक्षिण और पश्चिम के कुछ क्षेत्रों में रैयतवारी तथा उत्तर भारत के कई हिस्सों में महालवारी व्यवस्था लागू हुई।
इन व्यवस्थाओं का किसानों, जमींदारों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ा। राजस्व की मांग कई बार कठोर रही और कृषि संकट तथा ऋण बढ़ने की शिकायतें सामने आईं।
भारतीय उद्योग पर प्रभाव
भारत के वस्त्र लंबे समय तक विश्व प्रसिद्ध थे। औद्योगिक क्रांति के बाद ब्रिटेन में मशीन से बने कपड़े बड़े पैमाने पर तैयार होने लगे। व्यापारिक नीतियों और औपनिवेशिक ढाँचे ने भारतीय हस्तशिल्प और कई पारंपरिक उद्योगों पर दबाव बढ़ाया।
“सारा भारतीय उद्योग एक ही दिन खत्म हो गया” जैसी सरल बात सही नहीं है, लेकिन औपनिवेशिक व्यापार नीतियों ने उत्पादन और बाजार संरचना में बड़े बदलाव किए।
अफीम और चीन व्यापार
कंपनी ने भारतीय अफीम के उत्पादन और चीन के साथ व्यापार से बड़ी आय अर्जित की। यह व्यापार आगे चीन और ब्रिटेन के बीच अफीम युद्धों से जुड़े बड़े अंतरराष्ट्रीय संघर्ष का हिस्सा बना।
1857 का विद्रोह
1857 में कंपनी की बंगाल सेना के सैनिकों से शुरू हुआ विद्रोह उत्तर और मध्य भारत के कई क्षेत्रों में फैल गया। इसमें सैनिकों के साथ अनेक शासक, किसान, जमींदार और स्थानीय समूह अलग-अलग कारणों से शामिल हुए।
कारतूस विवाद तत्काल कारणों में था, लेकिन असंतोष के पीछे सैन्य भेदभाव, राज्य विलय, भूमि-राजस्व, धार्मिक-सांस्कृतिक आशंकाएँ और राजनीतिक असंतोष जैसे कई कारण थे।
विस्तृत जानकारी के लिए 1857 के विद्रोह का इतिहास पढ़ सकते हैं।
कंपनी का शासन कब समाप्त हुआ?
1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश संसद ने भारत शासन अधिनियम 1858 पारित किया। इसके बाद भारत का शासन ईस्ट इंडिया कंपनी से लेकर सीधे ब्रिटिश राजसत्ता के अधीन कर दिया गया।
यही कंपनी के राजनीतिक शासन का अंत था। हालांकि कंपनी कानूनी संस्था के रूप में कुछ समय और मौजूद रही और अंततः 1874 में औपचारिक रूप से भंग हुई।
महत्वपूर्ण समयरेखा
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1600 | कंपनी को शाही चार्टर मिला |
| 1608 | विलियम हॉकिन्स सूरत पहुँचे |
| 1613 | सूरत में स्थायी व्यापारिक आधार मजबूत हुआ |
| 1615 | सर थॉमस रो जहांगीर के दरबार पहुँचे |
| 1639-40 | मद्रास और फोर्ट सेंट जॉर्ज का विकास |
| 1668 | बंबई कंपनी को पट्टे पर मिला |
| 1690 के आसपास | कलकत्ता क्षेत्र में कंपनी का आधार मजबूत हुआ |
| 1717 | फर्रुखसियर का महत्वपूर्ण फरमान |
| 1757 | प्लासी का युद्ध |
| 1764 | बक्सर का युद्ध |
| 1765 | बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी |
| 1773 | रेगुलेटिंग एक्ट |
| 1784 | पिट्स इंडिया एक्ट |
| 1813 | व्यापारिक एकाधिकार का बड़ा हिस्सा समाप्त |
| 1833 | कंपनी का वाणिज्यिक कार्य लगभग समाप्त |
| 1857 | बड़ा विद्रोह |
| 1858 | कंपनी शासन समाप्त |
| 1874 | कंपनी का कानूनी विघटन |
पुराने लेख की प्रमुख गलतियाँ
| पुराना दावा | सही समझ |
|---|---|
| कंपनी 1599 में स्थापित हुई | तैयारी 1599 में हुई, लेकिन शाही चार्टर और आधिकारिक गठन 31 दिसंबर 1600 को हुआ। |
| थॉमस स्टीफंस 1603 में अकबर के दरबार कंपनी के दूत थे | यह मानक कंपनी इतिहास से समर्थित नहीं; हॉकिन्स और रो प्रमुख प्रारंभिक दूत थे। |
| जॉब चार्नॉक ने अकेले कलकत्ता शहर बनाया | कलकत्ता कई पहले से मौजूद बस्तियों और कंपनी के क्रमिक विकास से बना। |
| प्लासी के बाद कंपनी पूरे भारत की शासक बन गई | राजनीतिक विस्तार लगभग एक सदी तक चला। |
| 1765 में पूरे भारत में कर-मुक्त व्यापार मिला | इलाहाबाद समझौता युद्धोत्तर राजनीति और दीवानी अधिकार से जुड़ा था। |
| कंपनी शासन 1857 में खत्म हुआ | कानूनी रूप से शासन 1858 में ब्रिटिश राजसत्ता को स्थानांतरित हुआ। |
विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
- ईस्ट इंडिया कंपनी को 31 दिसंबर 1600 को शाही चार्टर मिला।
- शुरुआत में कंपनी व्यापारिक संस्था थी।
- सूरत, मद्रास, बंबई और कलकत्ता इसके बड़े प्रारंभिक केंद्र बने।
- 1757 का प्लासी युद्ध बंगाल की राजनीति में बड़ा मोड़ था।
- 1764 बक्सर की जीत ने कंपनी की राजनीतिक शक्ति और बढ़ाई।
- 1765 में बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी मिली।
- कंपनी ने मैसूर और मराठों से बड़े युद्ध किए।
- 1857 के विद्रोह के बाद 1858 में कंपनी शासन समाप्त हुआ।
- कंपनी कानूनी रूप से 1874 में भंग हुई।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना कब हुई?
इसे 31 दिसंबर 1600 को महारानी एलिजाबेथ प्रथम के शाही चार्टर से आधिकारिक रूप मिला।
कंपनी भारत में पहली बार क्यों आई?
उसका प्रारंभिक उद्देश्य व्यापार था, विशेष रूप से मसाले, कपड़ा और अन्य एशियाई वस्तुएँ खरीदना।
प्लासी का युद्ध कब हुआ?
23 जून 1757 को सिराजुद्दौला और कंपनी के बीच प्लासी का युद्ध हुआ।
बक्सर का युद्ध क्यों महत्वपूर्ण था?
1764 की जीत के बाद कंपनी को बंगाल से आगे राजनीतिक शक्ति और 1765 में दीवानी अधिकार हासिल करने की स्थिति मिली।
ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन कब समाप्त हुआ?
भारत शासन अधिनियम 1858 के बाद शासन ब्रिटिश राजसत्ता के अधीन चला गया।
निष्कर्ष
ईस्ट इंडिया कंपनी का इतिहास दिखाता है कि व्यापार, सैन्य शक्ति और राजनीति कैसे एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं। 1600 में व्यापार के लिए बनी कंपनी ने धीरे-धीरे भारतीय शासकों से व्यापारिक सुविधाएँ लीं, निजी सेना खड़ी की, स्थानीय राजनीति में हस्तक्षेप किया और प्लासी तथा बक्सर जैसी जीतों के बाद राजस्व-सत्ता हासिल की। 19वीं सदी तक वह भारत के बड़े हिस्से की वास्तविक शासक बन चुकी थी। 1857 के विद्रोह ने इस व्यवस्था की सीमाएँ उजागर कीं और 1858 में कंपनी शासन समाप्त हो गया।