वायु का उच्च वायुदाब क्षेत्र से निम्न वायुदाब क्षेत्र की ओर क्षैतिज गति करना पवन कहलाता है। पृथ्वी के घूर्णन, तापमान, वायुदाब, स्थलरूप और घर्षण के कारण पवन की दिशा तथा गति बदल सकती है। मौसम विज्ञान में पवनों को समझना वर्षा, तापमान, समुद्री यात्रा, कृषि और आपदा-सावधानी के लिए महत्वपूर्ण है।
पवन बनने के मुख्य कारण
सूर्य पृथ्वी की सतह को हर जगह एक-सा गर्म नहीं करता। गर्म हवा हल्की होकर ऊपर उठती है, जबकि अपेक्षाकृत ठंडी हवा नीचे रहती है। इससे वायुदाब में अंतर बनता है और हवा चलती है। पृथ्वी के घूर्णन से उत्पन्न कोरिऑलिस प्रभाव पवनों की दिशा मोड़ता है—उत्तरी गोलार्ध में दाईं और दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर।
पवनों के प्रमुख प्रकार
स्थायी पवनें
जो पवनें वर्ष भर लगभग निश्चित पवन-पट्टियों में चलती हैं, उन्हें स्थायी या ग्रहव्यापी पवनें कहा जाता है। व्यापारिक पवनें, पछुआ पवनें और ध्रुवीय पूर्वी पवनें इसके प्रमुख उदाहरण हैं। इनके वास्तविक मार्ग पर महासागर, महाद्वीप और ऋतुओं का प्रभाव पड़ सकता है।
व्यापारिक पवनें
उपोष्ण उच्च-दाब पट्टियों से भूमध्यरेखीय निम्न-दाब पट्टी की ओर चलने वाली पवनों को व्यापारिक पवनें कहते हैं। उत्तरी गोलार्ध में ये सामान्यतः उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर और दक्षिणी गोलार्ध में दक्षिण-पूर्व से उत्तर-पश्चिम दिशा की ओर चलती हैं।
पछुआ पवनें
मध्य अक्षांशों में उपोष्ण उच्च-दाब क्षेत्र से उपध्रुवीय निम्न-दाब क्षेत्र की ओर चलने वाली पवनें पछुआ पवनें कहलाती हैं। इनका सामान्य प्रवाह पश्चिम से पूर्व की ओर होता है। पश्चिमी यूरोप के मौसम पर इनका प्रभाव विशेष रूप से पढ़ाया जाता है।
ध्रुवीय पूर्वी पवनें
ध्रुवीय उच्च-दाब क्षेत्रों से उपध्रुवीय निम्न-दाब क्षेत्रों की ओर बहने वाली ठंडी पवनें ध्रुवीय पूर्वी पवनें कहलाती हैं।
मौसमी पवनें: मानसून
जिन पवनों की दिशा ऋतु के साथ बदलती है, वे मौसमी पवनें कहलाती हैं। भारत का मानसून इसका सबसे प्रमुख उदाहरण है। गर्मियों में स्थल और समुद्र के ताप में अंतर तथा वायुमंडलीय परिसंचरण के कारण दक्षिण-पश्चिम मानसून वर्षा लाता है। सर्दियों में उत्तर-पूर्वी पवनों का प्रभाव बढ़ता है; तमिलनाडु तट पर उत्तर-पूर्व मानसून से भी वर्षा मिलती है। भारत की कृषि और जल-संसाधन मानसून से गहराई से जुड़े हैं।
स्थानीय पवनें
छोटे क्षेत्र में तापमान और स्थलरूप के अंतर से चलने वाली पवनें स्थानीय पवनें कहलाती हैं। दिन में समुद्र से भूमि की ओर चलने वाली समुद्री समीर और रात में भूमि से समुद्र की ओर चलने वाली थल समीर इसके सरल उदाहरण हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में दिन और रात के तापांतर से घाटी तथा पर्वत समीर भी बनते हैं।
गर्म, ठंडी और धूलभरी पवनें
कुछ स्थानीय पवनें अपने तापमान या प्रभाव से पहचानी जाती हैं। उत्तर-पश्चिम भारत की गर्म और शुष्क ग्रीष्मकालीन पवन को लू कहा जाता है। लू से बचने के लिए दोपहर की धूप में श्रम कम करना, पानी पीना और बच्चों तथा बुजुर्गों का ध्यान रखना जरूरी है। धूलभरी आँधी या तेज झोंके के समय खुले स्थान, कमजोर ढाँचे और बिजली के तारों से सावधान रहें।
पवनों का महत्त्व
पवनें ताप का वितरण, बादल, वर्षा, समुद्री धाराएँ और वायु-ऊर्जा को प्रभावित करती हैं। वे प्रदूषक कणों के फैलाव में भी भूमिका निभाती हैं। अत्यधिक तेज हवा पेड़, बिजली लाइन और यातायात को नुकसान पहुँचा सकती है, इसलिए मौसम चेतावनी पर ध्यान देना चाहिए। पर्यावरण के घटकों और मौसम के रिश्ते के लिए पर्यावरण और इसके तत्व लेख भी उपयोगी है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
पवन किस दिशा में चलती है?
पवन सामान्यतः उच्च वायुदाब से निम्न वायुदाब की ओर चलती है, लेकिन पृथ्वी का घूर्णन और घर्षण उसकी दिशा को प्रभावित करते हैं।
भारत में मानसून क्यों महत्वपूर्ण है?
मानसून वर्षा, कृषि, जलाशयों और अनेक आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करता है।
लू क्या है?
लू उत्तर-पश्चिम भारत में गर्मियों के दौरान चलने वाली बहुत गर्म और शुष्क स्थानीय पवन है।
निष्कर्ष
स्थायी, मौसमी और स्थानीय पवनें पृथ्वी के मौसम तंत्र को समझने की आधारभूत कुंजी हैं। इनके पीछे वायुदाब, तापमान और पृथ्वी के घूर्णन का प्रभाव काम करता है।