भारत के राज्यों के बीच नदी जल विवाद Water disputes between States in Hindi

भारत के राज्यों के बीच नदी जल विवाद केवल “किस राज्य को कितना पानी मिले” का प्रश्न नहीं है। इसमें वर्षा, बाँध, सिंचाई, पेयजल, बिजली, पर्यावरणीय प्रवाह, पुरानी संधियाँ, राज्य पुनर्गठन और नदी के ऊपरी तथा निचले हिस्सों की अलग जरूरतें शामिल होती हैं। इसी कारण कावेरी, कृष्णा, नर्मदा, महादायी, महानदी, रावी-ब्यास और वंशधारा जैसे विवाद दशकों तक चल सकते हैं।

भारत सरकार ने अंतरराज्यीय नदी जल विवादों के निपटारे के लिए अंतरराज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 बनाया है। फरवरी 2026 में केंद्र सरकार द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार अब तक 9 जल विवाद न्यायाधिकरण गठित किए जा चुके हैं और उनमें से 5 ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की है। हर नदी विवाद की स्थिति अलग है—कुछ में अंतिम निर्णय लागू हो चुका है, कुछ में प्रबंधन प्राधिकरण बने हैं और कुछ में न्यायाधिकरण या बातचीत की प्रक्रिया जारी रही है।

भारत की नदी प्रणालियों की मूल जानकारी के लिए भारत की प्रमुख नदियाँ वाला लेख भी पढ़ सकते हैं।

Table of Content

राज्यों के बीच नदी जल विवाद क्यों होते हैं?

एक नदी अक्सर एक राज्य से निकलकर दूसरे राज्य में जाती है। ऊपरी राज्य बाँध या नहर बनाता है तो निचले राज्य को चिंता हो सकती है कि उसके हिस्से का प्रवाह कम होगा। वहीं ऊपरी राज्य तर्क देता है कि उसे भी सिंचाई, पेयजल और विकास के लिए नदी का उचित उपयोग करने का अधिकार है।

मुख्य कारण इस प्रकार हैं:

  • अनियमित मानसून और सूखा
  • बढ़ती सिंचाई जरूरत
  • शहरों की पेयजल मांग
  • नए बाँध और जलाशय
  • राज्यों के बीच पुरानी जल-संधियाँ
  • नदी घाटी में जल उपलब्धता के अलग अनुमान
  • राज्य विभाजन के बाद नए हिस्सेदार
  • पर्यावरणीय प्रवाह और डेल्टा की जरूरत
  • जलवायु परिवर्तन और वर्षा की अनिश्चितता

संविधान में नदी जल विवाद का आधार

पानी सामान्यतः राज्यों से जुड़ा विषय है, लेकिन अंतरराज्यीय नदी और नदी घाटी का प्रबंधन केंद्र और राज्यों दोनों के हित से जुड़ जाता है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 262 संसद को अंतरराज्यीय नदी जल विवादों के निपटारे के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है।

इसी आधार पर अंतरराज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 लागू हुआ।

जल विवाद न्यायाधिकरण कैसे बनता है?

जब किसी राज्य सरकार की शिकायत बातचीत से हल नहीं होती और केंद्र सरकार मानती है कि विवाद का न्यायिक निपटारा जरूरी है, तब अधिनियम के तहत जल विवाद न्यायाधिकरण गठित किया जा सकता है।

न्यायाधिकरण नदी की उपलब्ध जलराशि, राज्यों के दावे, सिंचाई क्षेत्र, परियोजनाएँ, ऐतिहासिक उपयोग और अन्य तकनीकी तथ्यों का अध्ययन करता है। इसके बाद वह रिपोर्ट और निर्णय देता है।

क्या न्यायाधिकरण बनते ही विवाद खत्म हो जाता है?

नहीं। निर्णय के बाद भी व्याख्या, क्रियान्वयन, सूखे वर्ष में पानी छोड़ने, नए बाँध, जल मापन और प्रबंधन को लेकर मतभेद हो सकते हैं। इसलिए कई मामलों में प्रबंधन प्राधिकरण या निगरानी समितियाँ भी बनानी पड़ती हैं।

भारत के प्रमुख नदी जल विवाद एक नजर में

नदी/विवादमुख्य राज्य/क्षेत्रप्रमुख व्यवस्था
कावेरीकर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, पुडुचेरीन्यायाधिकरण, सर्वोच्च न्यायालय संशोधन, प्रबंधन प्राधिकरण
कृष्णामहाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेशकृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण-I और II
नर्मदामध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थाननर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण का निर्णय
रावी-ब्यासपंजाब, हरियाणा, राजस्थानरावी-ब्यास न्यायाधिकरण और न्यायिक विवाद
महादायीगोवा, कर्नाटक, महाराष्ट्रमहादायी जल विवाद न्यायाधिकरण
महानदीओडिशा, छत्तीसगढ़महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण और हाल की बातचीत
वंशधाराओडिशा, आंध्र प्रदेशवंशधारा जल विवाद न्यायाधिकरण
गोदावरीकई दक्कनी और मध्य भारतीय राज्यगोदावरी न्यायाधिकरण और अंतरराज्यीय समझौते

1. कावेरी नदी जल विवाद

कावेरी नदी कर्नाटक के पश्चिमी घाट क्षेत्र से निकलकर तमिलनाडु की ओर बहती है और आगे बंगाल की खाड़ी में गिरती है। केरल और पुडुचेरी भी कावेरी घाटी के हिस्सेदार हैं।

कावेरी विवाद की जड़ें औपनिवेशिक काल के 1892 और 1924 के समझौतों तक जाती हैं। स्वतंत्रता के बाद तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच सिंचाई क्षेत्र, जलाशय और पानी छोड़ने की मात्रा पर मतभेद बढ़ते गए।

कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण

केंद्र सरकार ने 1990 में कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण गठित किया। न्यायाधिकरण ने 2007 में अंतिम निर्णय दिया। इसके बाद राज्यों ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया।

2018 में सर्वोच्च न्यायालय ने जल आवंटन में कुछ संशोधन किया। इसके बाद केंद्र ने कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण और कावेरी जल विनियमन समिति बनाई।

इसलिए पुराने लेख का “कावेरी विवाद अभी केवल ट्रिब्यूनल में है” वाला ढाँचा अब पुराना है। आज प्रबंधन व्यवस्था सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय और केंद्र की योजना से जुड़ी है।

2. कृष्णा नदी जल विवाद

कृष्णा नदी महाराष्ट्र के महाबलेश्वर क्षेत्र से निकलती है और कर्नाटक, तेलंगाना तथा आंध्र प्रदेश की ओर बहती है। पुराने लेख में इसे “आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के बीच कावेरी जल विवाद” लिखा गया था, जो स्पष्ट रूप से गलत था।

कृष्णा के लिए पहला न्यायाधिकरण 1969 में गठित हुआ। बाद में बदलती जल जरूरतों के कारण कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण-II 2004 में बना। उसने 2010 में रिपोर्ट दी और 2013 में आगे की रिपोर्ट दी।

तेलंगाना बनने के बाद नया प्रश्न

2014 में आंध्र प्रदेश के विभाजन के बाद तेलंगाना नया राज्य बना। इसके बाद कृष्णा जल बँटवारे में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के बीच अतिरिक्त मुद्दे सामने आए।

केंद्र सरकार की दिसंबर 2025 की जानकारी के अनुसार अतिरिक्त संदर्भ विषय कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण-II के सामने विचाराधीन थे और न्यायाधिकरण की अवधि 31 जुलाई 2026 तक बढ़ाई गई थी। इसके बाद की प्रक्रिया के लिए नवीनतम राजपत्र और न्यायाधिकरण आदेश देखना चाहिए, क्योंकि यह स्थिति समय के साथ बदल सकती है।

3. नर्मदा जल विवाद

नर्मदा मध्य प्रदेश के अमरकंटक क्षेत्र से निकलती है और पश्चिम की ओर बहकर अरब सागर में गिरती है। इसके जल उपयोग से मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान जुड़े हैं।

नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण 1969 में गठित हुआ और उसने 1979 में अपना निर्णय दिया। निर्णय में केवल जल-विभाजन नहीं, बाँध स्तर, पुनर्वास और परियोजना से जुड़े कई पहलू भी महत्वपूर्ण रहे।

पुराने लेख में इसे केवल मध्य प्रदेश और गुजरात का विवाद कहा गया था। यह अधूरा था क्योंकि महाराष्ट्र और राजस्थान भी संबंधित राज्य हैं।

सरदार सरोवर परियोजना

नर्मदा विवाद का सबसे चर्चित हिस्सा सरदार सरोवर परियोजना रही है। इसमें सिंचाई और पेयजल के लाभ के साथ विस्थापन, पुनर्वास और पर्यावरणीय प्रभाव पर लंबे समय तक बहस हुई।

किसी नदी जल विवाद को केवल “किसे कितना पानी मिला” से समझना इसलिए अधूरा है; परियोजना का सामाजिक और पर्यावरणीय असर भी महत्वपूर्ण होता है।

4. रावी-ब्यास जल विवाद

रावी और ब्यास नदी जल से पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के हित जुड़े हैं। पंजाब के पुनर्गठन और हरियाणा के निर्माण के बाद पानी के हिस्से तथा सतलुज-यमुना लिंक नहर को लेकर विवाद अधिक जटिल हुआ।

रावी-ब्यास जल विवाद न्यायाधिकरण 1986 में गठित हुआ और 1987 में रिपोर्ट दी। इसके बाद भी कई कानूनी और राजनीतिक मुद्दे जारी रहे।

इसे केवल “हरियाणा ने पंजाब से पानी माँगा” कहकर समझाना पर्याप्त नहीं है। इसमें पुराने समझौते, राज्य पुनर्गठन और नहर निर्माण के प्रश्न शामिल हैं।

5. महादायी नदी जल विवाद

महादायी नदी, जिसे गोवा में मंडोवी भी कहा जाता है, कर्नाटक से निकलकर गोवा की ओर बहती है। इस विवाद में कर्नाटक, गोवा और महाराष्ट्र शामिल हैं।

कर्नाटक पानी के एक हिस्से को पेयजल और अन्य उपयोग के लिए मोड़ना चाहता रहा है, जबकि गोवा ने नदी के प्राकृतिक प्रवाह और पर्यावरणीय प्रभाव पर चिंता जताई है।

महादायी जल विवाद न्यायाधिकरण 2010 में गठित हुआ और 2018 में रिपोर्ट और निर्णय दिया। इसके बाद भी परियोजनाओं और क्रियान्वयन से जुड़े कानूनी प्रश्न बने रहे।

6. महानदी जल विवाद

महानदी छत्तीसगढ़ से निकलकर ओडिशा में लंबी दूरी तय करती है और बंगाल की खाड़ी में गिरती है। ओडिशा ने ऊपरी हिस्से में छत्तीसगढ़ की परियोजनाओं से गैर-मानसूनी प्रवाह पर प्रभाव की चिंता जताई।

केंद्र सरकार ने 12 मार्च 2018 को महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण गठित किया।

2026 में बातचीत की नई कोशिश

30 जुलाई 2026 को केंद्रीय जल शक्ति मंत्री की अध्यक्षता में ओडिशा और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्रियों की बैठक हुई। केंद्र ने इसे मैत्रीपूर्ण समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। संयुक्त तकनीकी समिति और विस्तारित तकनीकी समिति के माध्यम से भी बातचीत आगे बढ़ाई गई।

इसलिए महानदी विवाद को केवल पुराने न्यायाधिकरण विवरण तक सीमित करना अब पर्याप्त नहीं है; 2026 में प्रत्यक्ष बातचीत और तकनीकी सहमति की कोशिश भी महत्वपूर्ण है।

7. वंशधारा नदी विवाद

वंशधारा नदी ओडिशा से निकलकर आंध्र प्रदेश की ओर जाती है। विवाद मुख्य रूप से नदी पर प्रस्तावित परियोजनाओं, पानी के उपयोग और निचले क्षेत्र पर संभावित प्रभाव से जुड़ा रहा है।

केंद्र ने वंशधारा जल विवाद न्यायाधिकरण गठित किया। इस मामले में न्यायाधिकरण ने विभिन्न चरणों में आदेश और रिपोर्ट दिए। इसे “सिर्फ दो राज्यों के बीच साधारण बाँट” के रूप में समझना उचित नहीं है; परियोजना-विशिष्ट तकनीकी प्रश्न भी महत्वपूर्ण रहे हैं।

8. गोदावरी नदी जल विवाद

गोदावरी महाराष्ट्र के नासिक क्षेत्र से निकलती है और दक्कन के बड़े हिस्से से गुजरते हुए बंगाल की खाड़ी में जाती है। ऐतिहासिक रूप से महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और ओडिशा सहित कई राज्यों के हित इससे जुड़े थे; राज्य पुनर्गठन के बाद तेलंगाना और छत्तीसगढ़ भी संबंधित नदी घाटी व्यवस्था में महत्वपूर्ण हैं।

गोदावरी जल विवाद न्यायाधिकरण 1969 में गठित हुआ और उसका निर्णय 1980 में प्रकाशित हुआ। पुराने लेख में “विवाद अभी तक पूरी तरह सुलझा नहीं” लिखना बहुत सामान्य था। मूल जल-विभाजन का बड़ा भाग न्यायाधिकरण और अंतरराज्यीय समझौतों से तय हो चुका है, हालांकि परियोजना-विशिष्ट विवाद अलग से सामने आ सकते हैं।

9. यमुना जल बँटवारा

यमुना जल का उपयोग हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और राजस्थान से जुड़ा है। ऊपरी यमुना के जल बँटवारे के लिए राज्यों के बीच समझौते और प्रबंधन व्यवस्था बनाई गई है।

पुराने लेख में 1954 के समझौते और 77 प्रतिशत बनाम 23 प्रतिशत जैसी संख्या बिना पर्याप्त संदर्भ दी गई थी। ऐसी पुरानी हिस्सेदारी को आज की पूरी व्यवस्था मानना भ्रामक है। आधुनिक ऊपरी यमुना व्यवस्था 1990 के दशक के बहु-राज्य समझौते और बोर्ड से जुड़ी है।

10. सोन नदी और बाणसागर समझौता

सोन नदी घाटी में मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार के हित जुड़े हैं। 1973 का बाणसागर समझौता तीनों राज्यों के बीच परियोजना और जल उपयोग से जुड़ा महत्वपूर्ण समझौता था।

इसे मुख्य वर्तमान न्यायाधिकरण विवादों की सूची में उसी तरह रखना सही नहीं है जैसे कावेरी या महानदी को रखा जाता है। पुराने लेख में रिहंद का “पूरा पानी बिहार को” देने जैसी बात अत्यधिक सरल और भ्रामक थी।

राज्य जल विवाद में “ऊपरी” और “निचला” राज्य क्या होता है?

नदी जिस राज्य से पहले गुजरती है वह उस हिस्से में ऊपरी राज्य और आगे का राज्य निचला राज्य कहलाता है। ऊपरी राज्य के बाँध और पानी रोकने की क्षमता अधिक हो सकती है, जबकि निचला राज्य प्राकृतिक प्रवाह पर अधिक निर्भर हो सकता है।

इसी कारण नदी घाटी को एक संपूर्ण इकाई के रूप में देखना महत्वपूर्ण है।

सूखे वर्ष में विवाद क्यों बढ़ता है?

सामान्य वर्ष में आवंटन लागू करना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है, लेकिन कम वर्षा वाले वर्ष में उपलब्ध जल ही घट जाता है। तब प्रश्न उठता है कि कमी का बोझ सभी राज्य किस अनुपात में बाँटें। कावेरी जैसे विवादों में यही मुद्दा बार-बार महत्वपूर्ण रहा है।

जल मापन और साझा आँकड़े क्यों जरूरी हैं?

राज्यों के बीच भरोसा तभी बढ़ सकता है जब वर्षा, जलाशय स्तर, नदी प्रवाह, सिंचाई उपयोग और भूजल के विश्वसनीय आँकड़े साझा हों। यदि हर राज्य अलग आंकड़ा पेश करे तो बातचीत कठिन हो जाती है।

बाँध बनाने से विवाद क्यों पैदा होता है?

बाँध पानी रोककर सिंचाई, बिजली या पेयजल उपलब्ध करा सकता है। लेकिन निचले हिस्से में प्रवाह का समय और मात्रा बदल सकती है। इससे कृषि, मत्स्य पालन, डेल्टा और पारिस्थितिकी प्रभावित हो सकती है।

इसीलिए नई परियोजना का तकनीकी और पर्यावरणीय मूल्यांकन महत्वपूर्ण है।

जलवायु परिवर्तन का प्रभाव

वर्षा की तीव्रता, लंबे सूखे, अत्यधिक बाढ़ और तापमान में बदलाव नदी घाटियों की जल उपलब्धता को अधिक अनिश्चित बना सकते हैं। पुराने ऐतिहासिक प्रवाह के आधार पर बना जल-बँटवारा भविष्य में नई चुनौतियाँ पैदा कर सकता है।

समाधान के प्रमुख रास्ते

  1. राज्यों के बीच सीधी बातचीत
  2. केंद्र की मध्यस्थता
  3. जल विवाद न्यायाधिकरण
  4. प्रबंधन प्राधिकरण और निगरानी समिति
  5. न्यायिक समीक्षा और संबंधित कानूनी प्रक्रिया
  6. साझा जल आँकड़े और वास्तविक समय मापन
  7. पूरी नदी घाटी के आधार पर योजना
  8. जल-दक्ष कृषि और मांग प्रबंधन

सिर्फ अधिक बाँध क्या समाधान है?

नहीं। बाँध कुछ जरूरतें पूरी कर सकते हैं, लेकिन नदी विवाद का स्थायी समाधान जल उपलब्धता और मांग दोनों के प्रबंधन से आता है। ड्रिप सिंचाई, फसल चयन, शहरों में जल पुनर्चक्रण, वर्षा जल संचयन और रिसाव कम करना भी महत्वपूर्ण है।

भारत की सिंचाई प्रणाली और वर्षा जल संचयन वाले लेख इस विषय को आगे समझने में मदद करेंगे।

नदी जल विवाद और सहकारी संघवाद

नदी राज्य की सीमा पर रुकती नहीं है। इसलिए जल प्रबंधन में केवल कानूनी जीत पर्याप्त नहीं; राज्यों को लंबे समय तक साथ काम करना पड़ता है। साझा निगरानी, मौसम पूर्वानुमान, जलाशय संचालन और आपदा सूचना में सहयोग आवश्यक है।

महानदी पर 2026 की ओडिशा-छत्तीसगढ़ वार्ता इसी सहकारी दृष्टिकोण का हालिया उदाहरण है।

पुराने लेख की प्रमुख गलतियाँ

पुरानी जानकारीसही समझ
कावेरी न्यायाधिकरण 1990 में “सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में” बनाकेंद्र सरकार ने अंतरराज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम के तहत न्यायाधिकरण गठित किया।
नर्मदा केवल मध्य प्रदेश और गुजरात का विवादमहाराष्ट्र और राजस्थान भी संबंधित राज्य हैं।
गोदावरी विवाद अभी पूरी तरह अनिर्णीतमुख्य न्यायाधिकरण निर्णय 1980 में प्रकाशित हो चुका; परियोजना-विशिष्ट प्रश्न अलग हो सकते हैं।
कृष्णा विवाद “आंध्र और कर्नाटक में कावेरी जल” परयह कृष्णा नदी का अलग अंतरराज्यीय विवाद है और महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश से जुड़ा है।
यमुना का वर्तमान बँटवारा केवल पुराने दो-राज्य प्रतिशत से तयआधुनिक व्यवस्था बहु-राज्य समझौतों और प्रबंधन संस्थाओं से जुड़ी है।
सोन-रिहंद का पूरा पानी बिहार कोबाणसागर व्यवस्था अधिक जटिल अंतरराज्यीय समझौते पर आधारित है।

विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

  1. अनुच्छेद 262 अंतरराज्यीय नदी जल विवादों पर संसद को कानून बनाने की शक्ति देता है।
  2. अंतरराज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम 1956 में बनाया गया।
  3. कावेरी न्यायाधिकरण 1990 में गठित हुआ और अंतिम निर्णय 2007 में दिया।
  4. 2018 में कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण बनाया गया।
  5. कृष्णा के लिए दो अलग न्यायाधिकरण चरण रहे हैं।
  6. नर्मदा न्यायाधिकरण का प्रमुख निर्णय 1979 का है।
  7. महादायी विवाद में गोवा, कर्नाटक और महाराष्ट्र शामिल हैं।
  8. महानदी विवाद मुख्यतः ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच है।
  9. 2026 में महानदी पर मैत्रीपूर्ण समाधान के लिए उच्चस्तरीय बातचीत हुई।
  10. जल विवाद का समाधान केवल अदालत नहीं, डेटा साझाकरण और नदी घाटी प्रबंधन से भी जुड़ा है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारत में नदी जल विवाद कौन सुलझाता है?

पहले राज्यों और केंद्र के बीच बातचीत की कोशिश होती है। आवश्यकता होने पर अंतरराज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम के तहत न्यायाधिकरण गठित किया जा सकता है।

कावेरी विवाद किन राज्यों से जुड़ा है?

मुख्य रूप से कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और केंद्रशासित प्रदेश पुडुचेरी।

महानदी विवाद किन राज्यों के बीच है?

ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच।

कृष्णा विवाद में कौन-से राज्य शामिल हैं?

महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश प्रमुख हिस्सेदार हैं।

क्या न्यायाधिकरण का फैसला होने के बाद विवाद हमेशा खत्म हो जाता है?

नहीं। क्रियान्वयन, सूखा, नई परियोजनाएँ और जल मापन को लेकर नए प्रश्न उठ सकते हैं।

राज्यों के जल विवाद कम कैसे हो सकते हैं?

पारदर्शी आँकड़े, संयुक्त नदी घाटी योजना, जल-दक्ष सिंचाई, समय पर बातचीत और स्पष्ट प्रबंधन व्यवस्था विवाद कम करने में मदद कर सकती है।

निष्कर्ष

भारत के नदी जल विवादों का कोई एक सरल समाधान नहीं है। एक ही नदी कई राज्यों की कृषि, शहर, बिजली और पर्यावरण को सहारा देती है। इसलिए निष्पक्ष बँटवारे के साथ नदी की दीर्घकालीन सेहत भी महत्वपूर्ण है। कावेरी का प्रबंधन प्राधिकरण, कृष्णा की न्यायाधिकरण प्रक्रिया और 2026 की महानदी वार्ता दिखाती है कि कानून, तकनीकी आँकड़े और राज्यों के बीच सहयोग—तीनों की जरूरत है।

विश्वसनीय स्रोत

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