प्रायद्वीपीय भारत भारत का प्राचीन, स्थिर और त्रिभुजाकार भू-भाग है। इसके दक्षिण में हिंद महासागर, पश्चिम में अरब सागर और पूर्व में बंगाल की खाड़ी है। तीन ओर जल से घिरे इस बड़े भूभाग के कारण इसे प्रायद्वीपीय भारत कहा जाता है। इसे मुख्यतः प्रायद्वीपीय पठार, पश्चिमी घाट, पूर्वी घाट और इनसे जुड़ी पहाड़ियों तथा नदी-घाटियों के रूप में समझा जाता है।
प्रायद्वीपीय भारत की स्थिति और प्रकृति
यह भूभाग हिमालय की तुलना में बहुत पुराना और अपेक्षाकृत स्थिर है। इसकी चट्टानों में आग्नेय और कायांतरित चट्टानें व्यापक रूप से मिलती हैं। लंबे समय तक अपरदन होने से यहाँ अत्यंत ऊँचे युवा पर्वतों की बजाय पठार, पहाड़ियाँ और घिसी हुई पर्वत-श्रृंखलाएँ अधिक दिखाई देती हैं। इसका बड़ा भाग दक्षिण भारत और मध्य भारत में फैला है, जबकि छोटा नागपुर, मालवा और मेघालय पठार जैसे क्षेत्र भी इस व्यापक भू-आकृतिक इकाई से जुड़े हैं।
मुख्य भाग
मध्य उच्चभूमि
नर्मदा नदी के उत्तर में मालवा पठार, बुंदेलखंड, बघेलखंड और छोटा नागपुर पठार जैसे क्षेत्र आते हैं। अरावली भारत की अत्यंत प्राचीन पर्वत प्रणालियों में है; इसकी सबसे ऊँची चोटी गुरु शिखर राजस्थान के माउंट आबू क्षेत्र में है। छोटा नागपुर पठार खनिज संसाधनों के लिए प्रसिद्ध है और झारखंड के साथ आसपास के क्षेत्रों तक फैला है।
दक्कन का पठार
नर्मदा नदी के दक्षिण का बड़ा त्रिकोणीय पठारी भाग दक्कन का पठार कहलाता है। यह पश्चिम में पश्चिमी घाट और पूर्व में पूर्वी घाट से घिरा है। इसके उत्तर-पश्चिम के व्यापक भाग में पुराने बेसाल्टिक लावा-प्रवाह से बनी काली मिट्टी मिलती है, जो कपास सहित कई फसलों के लिए उपयोगी है। मगर मिट्टी की उपयुक्तता वर्षा, सिंचाई और स्थानीय प्रबंधन पर भी निर्भर करती है।
विंध्य और सतपुड़ा
विंध्य और सतपुड़ा श्रेणियाँ मध्य भारत के महत्वपूर्ण स्थलरूप हैं। नर्मदा नदी विंध्य और सतपुड़ा के बीच की भ्रंश घाटी में पश्चिम की ओर बहती है। सतपुड़ा क्षेत्र की धूपगढ़ चोटी सबसे ऊँची चोटी के रूप में जानी जाती है। अमरकंटक क्षेत्र नर्मदा और सोन जैसी नदियों के उद्गम के लिए महत्वपूर्ण है।
पश्चिमी घाट और पूर्वी घाट
पश्चिमी घाट को सह्याद्रि भी कहा जाता है। यह पश्चिमी तट के समानांतर अपेक्षाकृत निरंतर पर्वत-तंत्र है और जैव-विविधता के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इसके ऊँचे भागों में दक्षिण भारत की प्रमुख चोटियाँ मिलती हैं; अनामुडी भारत की मुख्यभूमि की सबसे ऊँची चोटी है। पश्चिमी घाट अरब सागर से आने वाली मानसूनी हवाओं को ऊपर उठाता है, जिससे पश्चिमी ढालों पर वर्षा अधिक हो सकती है।
पूर्वी घाट पूर्वी तट के साथ स्थित असतत पहाड़ियों का समूह है। बड़ी नदियाँ इन्हें काटती हुई बंगाल की खाड़ी तक जाती हैं, इसलिए यह पश्चिमी घाट जैसा निरंतर अवरोध नहीं बनाता। नीलगिरि क्षेत्र पश्चिमी और पूर्वी घाट के बीच महत्त्वपूर्ण संपर्क क्षेत्र है। दोनों घाटों की तुलना करते समय “पूर्वी घाट बिल्कुल एक पर्वतमाला है” या “पश्चिमी घाट हर जगह समान ऊँचा है” जैसे सरलीकरण से बचना चाहिए।
प्रायद्वीपीय नदियाँ
इस क्षेत्र की अधिकांश बड़ी नदियाँ पूर्व की ओर बहती हुई बंगाल की खाड़ी में मिलती हैं। गोदावरी, कृष्णा, कावेरी और महानदी के नदी-तंत्र विस्तृत जलग्रहण क्षेत्र बनाते हैं। गोदावरी प्रायद्वीपीय भारत की सबसे लंबी नदी है और त्र्यंबकेश्वर के निकट से निकलती है। कावेरी कर्नाटक के ब्रह्मगिरि क्षेत्र से निकलकर दक्षिण-पूर्व की ओर बहती है। नर्मदा और ताप्ती उल्लेखनीय अपवाद हैं, जो पश्चिम की ओर बहकर अरब सागर में मिलती हैं। भारत की नदियों पर हमारा विस्तृत लेख भी पढ़ें।
प्रायद्वीपीय नदियों में हिमालयी नदियों की तुलना में मौसमी वर्षा का प्रभाव अधिक दिखाई देता है। अनेक नदियों पर सिंचाई, पेयजल और जलविद्युत के लिए परियोजनाएँ बनी हैं, लेकिन नदी-तंत्रों को केवल संसाधन नहीं, पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में भी देखना आवश्यक है।
खनिज, कृषि और अर्थव्यवस्था
प्रायद्वीपीय पठार में लौह अयस्क, कोयला, बॉक्साइट, मैंगनीज और अभ्रक जैसे कई खनिज क्षेत्रों का महत्व है। खनन से रोजगार और उद्योग को लाभ मिलता है, लेकिन जल, वन, स्थानीय समुदाय और भूमि पर प्रभाव को ध्यान में रखकर जिम्मेदार प्रबंधन जरूरी है। काली मिट्टी वाले क्षेत्रों में कपास, लाल और लेटराइट मिट्टी वाले क्षेत्रों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न फसलें उगाई जाती हैं। भारत में फसलों की ऋतु और प्रकार समझने के लिए भारत में फसलों के प्रकार भी देखें।
जलवायु और पर्यावरण
ऊँचाई, समुद्र से दूरी और मानसून की दिशा के कारण इस क्षेत्र में वर्षा का वितरण एक-सा नहीं है। पश्चिमी घाट की पवनाभिमुख ढालों पर अधिक वर्षा और वर्षाछाया क्षेत्रों में अपेक्षाकृत कम वर्षा हो सकती है। जंगलों की कटाई, खनन, अनियोजित निर्माण और जल-स्रोतों पर दबाव यहाँ की पारिस्थितिकी को प्रभावित कर सकते हैं। जलग्रहण संरक्षण, वन सुरक्षा और स्थानीय ज्ञान का सम्मान टिकाऊ विकास के लिए जरूरी है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रायद्वीपीय भारत को प्रायद्वीप क्यों कहते हैं?
क्योंकि इसका बड़ा दक्षिणी भाग तीन ओर से समुद्री जल—अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर—से घिरा है।
प्रायद्वीपीय भारत की सबसे लंबी नदी कौन-सी है?
गोदावरी प्रायद्वीपीय भारत की सबसे लंबी नदी मानी जाती है।
पश्चिमी घाट और पूर्वी घाट में मुख्य अंतर क्या है?
पश्चिमी घाट अपेक्षाकृत अधिक निरंतर और ऊँचा पर्वत-तंत्र है, जबकि पूर्वी घाट कई स्थानों पर नदियों से कटा हुआ असतत पहाड़ी तंत्र है।
निष्कर्ष
प्रायद्वीपीय भारत भारत के प्राचीन भू-आधार, नदियों, खनिजों, कृषि और जैव-विविधता को समझने की कुंजी है। इसके पठारों, घाटों और नदी-तंत्रों को तथ्यात्मक तथा पर्यावरण-संवेदनशील दृष्टि से पढ़ना चाहिए।

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