मुख्य सामग्री पर जाएँ

रानी लक्ष्मीबाई की जीवनी: Jhansi, 1857 Revolt, Gwalior और Historical Legacy

झांसी की रानी लक्ष्मी बाई जीवनी Jhansi ki Rani Laxmi Bai History Hindi
विषय सूची
  1. 1  झांसी की रानी लक्ष्मी बाई की जीवनी Jhansi ki Rani Laxmi Bai History Hindi
  2. 2  रानी लक्ष्मी बाई का प्रारंभिक जीवन Early Life of Rani Laxmi Bai
  3. 3  रानी लक्ष्मी बाई का विवाह Marriage of Rani Lakshmi Bai
  4. 4  महाराजा गंगाधर राव नेवालकर की मृत्यु Death of Maharaja Gangadhar Rao Nevalkar
  5. 5  रानी लक्ष्मी बाई ने राज्य का भार संभाला Rani Laxmi Bai Took over the Kingdom
  6. 6  झांसी की लड़ाई Battle of Jhansi (सन1857-1858 का भारतीय विद्रोह)
  7. 7  झांसी की रानी लक्ष्मी बाई की मृत्यु Death of Jhansi ki Rani Laxmi Bai
  8. 8  झांसी की रानी कविता - सुभद्रा कुमारी चौहान (Khoob Ladi Mardani Wah to Jhansi Wali Rani Thi)
  9. 9  Rani Lakshmibai की historical timeline
  10. 10  1857 uprising में role
  11. 11  Gwalior and death
  12. 12  Poetry vs history
  13. 13  Related reading
  14. 14  अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
  15. 15  स्रोत और संदर्भ

इस लेख में आप झांसी की रानी लक्ष्मी बाई की जीवनी Jhansi ki Rani Laxmi Bai History in Hindi पढेंगे। यहां आप जानेंगे उनका प्रारंभिक जीवन, विवाह, और 1857 के संघर्ष में उनके बलिदान के विषय में पुरी जानकारी। साथ ही हमने सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा लिखित प्रसिद्ध कविता झांसी की रानी भी इस लेख में दिया है।

झांसी की रानी लक्ष्मी बाई की जीवनी Jhansi ki Rani Laxmi Bai History Hindi

झांसी की रानी लक्ष्मी बाई, ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारत की आज़ादी की लड़ाई में अपना बहुत बड़ा योगदान दिया। एक महिला होते हुए भी उन्होंने अपने पराक्रम से ब्रिटिश राज को ललकारा और उनसे लड़ते हुए वो वीरगति को प्राप्त हुई।

सन 1857 के भारतीय विद्रोह में उन्होंने साहस के साथ ब्रिटिश राज का सामना किया था। उनके साहस और पराक्रम को आज भी पूरा विश्व याद करता है।

रानी लक्ष्मी बाई का प्रारंभिक जीवन Early Life of Rani Laxmi Bai

लक्ष्मी बाई का जन्म 19 नवम्बर 1828 को पवित्र स्थान वाराणसी में एक मराठी ब्राह्मण परिवार में पिता मोरो ताम्बे और माता भागीरथी बाई के घर में हुआ था। उनका नाम जन्म के समय मणिकर्णिका ताम्बे दिया गया था। उनके पिता मोरोपंत ताम्बे, बाजीराव के छोटे भाई चिम्माजी अप्पा के एक सेवक थे। जब मणिकर्णिका 4 वर्ष की थी तो उनकी माता का देहांत हो गया।

लक्ष्मी बाई के पिता बिठूर के एक न्यालय में एक पेशवा थे। वो लक्ष्मी बाई को बाजीराव के दरबार में ले गए जहाँ उन्हें सबने प्यार से ‘छबीली’ का नाम दिया। वहां लक्ष्मी बाई ने अपनी पढाई पूरी की और वह बचपन से ही अन्य लड़कियों की तुलना में अधिक स्वतंत्र थी। उन्हें बहुत ही कम उम्र में निशानेबाज़ी, तलवारबाजी और घुड़सवारी में रूचि थी।

रानी लक्ष्मी बाई का विवाह Marriage of Rani Lakshmi Bai

लक्ष्मी बाई (मणिकर्णिका) का विवाह झांसी के महाराजा गंगाधर राव नेवालकर से मई 1842 को हुआ। उनके विवाह के बाद से उन्हें रानी लक्ष्मी बाई के नाम से बुलाया गया। सन 1851 में रानी लक्ष्मी बाई ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम दामोदर राव रखा गया था। पर कुछ कारण वश 4 महीने बाद उसकी मृत्यु हो गयी।

यह माना जाता है कि अपने पुत्र की मृत्यु के दुख से महाराजा गंगाधर राव नेवालकर कभी निकल ही नहीं पाए और नवम्बर 1853 में उनकी मृत्यु हो गयी। अपनी मृत्यु से पूर्व महाराजा ने रानी लक्ष्मी के साथ मिलकर महाराजा के रिश्तेदार भाई के पुत्र जिसका नाम आनंद राव था, उसका नाम दामोदर राव रख कर गोद लिया। उस समय ब्रिटिश शासन को कोई आपत्ति ना हो इस लिए यह कर उन्होंने ब्रिटिश अफसरों के मौजूदगी में पूर्ण किया था।

उस समय ब्रिटिश राज ने एक नियम रखा था जिसके मुताबिक अगर किसी राजा की मृत्यु हो जाती है और उसका कोई उत्तराधिकारी नहीं है या उसने किसी को गोद लिया हो तो उसके पुरे राज्य पर ब्रिटिश सरकार (ईस्ट इंडिया कंपनी) का अधिकार होगा और रजा के परिवार को पेंशन के रूप में एक राशी दी जाएगी।

महाराजा गंगाधर राव नेवालकर की मृत्यु Death of Maharaja Gangadhar Rao Nevalkar

सन 1853 में महाराजा गंगाधर राव नेवालकर की मृत्यु के बाद, नए दामोदर राव (आनंद राव) के गोद लिए होने के कारण ब्रिटिश सरकार ने उसे उत्तराधिकारी नहीं माना और उसके सिहासन पर बैठने को खारीच कर दिया गया।

जब झांसी की रानी लक्ष्मी बाई को इसके विषय में पता चला तो वह रो पड़ी और उन्होंने कहा – ‘मैं झांसी को नहीं दूँगी’। उसके बाद महारानी लक्ष्मी बाई ने लन्दन में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ मुकदमा दायर किया पर उनके मुक़दमे को खरीच कर दिया गया। उसके बाद उन्हें 60,000 रुपए का पेंशन दिया गया और राज महल को छोड़ कर रानी महल में रहने का आदेश दिया गया।

रानी लक्ष्मी बाई ने राज्य का भार संभाला Rani Laxmi Bai Took over the Kingdom

परन्तु उसके बाद भी रानी लक्ष्मी बाई ने झांसी को ईस्ट इंडिया कंपनी को ना देने का संकल्प लिया और वो अपना सेना संगठित करने लगी। साथ ही उन्होंने अपने राज्य का उत्तरदायित्व भी संभाला।

रानी लक्ष्मी बाई घुड सवारी में निपूर्ण थी और उन्होंने महल के बीचों बिच घुड सवारी के लिए जगह भी बनाया था। उनके घोड़ों के नाम थे – सारंगी, पवन, और बादल। सन 1858 के समय किले से निकलने में घोड़े बादल की अहम भूमिका थी।

रानी लक्ष्मी बाई के महल को अब एक म्यूजियम के रूप में बदल दिया गया है। जो 9वीं और 12वीं शताब्दी  पुरातात्विक अवशेषों का एक संग्रह है।

झांसी की लड़ाई Battle of Jhansi (सन1857-1858 का भारतीय विद्रोह)

झांसी के महल को ना छोड़ने के कारण झांसी ब्रिटिश शासन के लिए विद्रोह का केंद्र बिंदु बन गया था। ईस्ट इंडिया कंपनी किसी भी तरह झांसी के महल, किले पर कब्ज़ा करना चाहती थी।

रानी लक्ष्मी बाई इस बात को पहले से ही जानती थी इस लिए उन्होंने अपनी मजबूत सेना तैयार करनी शुरू कर दी थी। इस देना में महिलाओं को सेना में लिया गया था और उन्हें भी युद्ध के लिए तलवारबाज़ी, घुड सवारी का प्रशिक्षण दिया गया था।

सितम्बर से अक्टूबर 1857 के बिच झांसी पर पड़ोसी राज्यों जैसे ओरछा तथा दतिया ने भी कब्ज़ा करने की कोशिश की पर रानी लक्ष्मी बाई के साहस और सेना ने उन्हें पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया।

उसके बाद जनवरी 1858 में ब्रिटिश सेना ने झांसी पर आक्रमण किया। झांसी का युद्ध लगभग 2 हफ़्तों तक चला परन्तु अंत में ब्रिटिश सेना ने झांसी के राज्य को कब्ज़े में कर लिए और घेर लिया। मजबूर हो कर झांसी की रानी को पुत्र दामोदर राव को वहां से लेकर किले को छोड़ना पड़ा।

झांसी की रानी लक्ष्मी बाई की मृत्यु Death of Jhansi ki Rani Laxmi Bai

किले को छोड़ने के बाद रानी लक्ष्मी बाई ने कालपी में शरण लिया। वहां उनकी मुलाकात तात्या टोपे से हुई। रानी लक्ष्मी बाई की सेना और तात्या टोपे की सेना ने मिलकर ग्वालियर के एक किले को कब्ज़े में कर लिया।

17 जून 1858 को ग्वालियर के पास कोटा की सराय में ब्रिटिश सेना से लड़ते-लड़ते रानी लक्ष्मी बाई की मृत्यु हो गयी। उसकी कहानी स्वतंत्रता सेनानियों के आगामी पीढ़ियों के लिए एक प्रकाश स्तम्भ बन गया। साथ ही उनके अपार प्रयासों के लिए झांसी की रानी लक्ष्मी बाई को ‘भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन के चिह्न’ के रूप में जाना जाता है।

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी…

झांसी की रानी कविता – सुभद्रा कुमारी चौहान (Khoob Ladi Mardani Wah to Jhansi Wali Rani Thi)

Famous Hindi Poem by Subhadra Kumari Chauhan

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।
महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।
निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।
अश्रुपूर्णा रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।
रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात?
जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।
बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी रोयीं रिनवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
‘नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार’।
यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपूर, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बड़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वन्द्ध असमानों में।
ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।
अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।
पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये अवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।
तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

और पढ़ें:

– कित्तूर रानी चेन्नम्मा का इतिहास
– रानी दुर्गावती के जीवन का इतिहास

– रानी पद्मिनी – पद्मावती का इतिहास

Rani Lakshmibai की historical timeline

Rani Lakshmibai का birth name Manikarnika Tambe था। Marriage के बाद वे Jhansi की queen बनीं। Raja Gangadhar Rao की death और adopted heir Damodar Rao की succession पर East India Company के refusal ने Jhansi annexation dispute को जन्म दिया।

1857 uprising में role

1857 rebellion के दौरान Jhansi political and military conflict का major centre बना। Lakshmibai ने fort defence और later military campaigning में direct role लिया। उनके struggle को केवल romantic legend नहीं, 1857 की complex regional politics के context में पढ़ना चाहिए।

Gwalior and death

1858 में Kalpi और Gwalior campaigns के बाद Kotah-ki-Serai area में fighting के दौरान उनकी death हुई। Exact final-moment narratives later heroic retellings में vary करती हैं। Core historical fact यह है कि वे active combat campaign में मारी गईं।

Poetry vs history

Subhadra Kumari Chauhan की famous poem ने Lakshmibai की national memory को shape किया, लेकिन poem literary work है, archival biography नहीं। School answers में dates और events historical sources से verify करें।

Related reading

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Rani Lakshmibai का birth name?

Manikarnika Tambe.

Jhansi dispute किससे जुड़ा था?

Adopted heir और British annexation policy से।

1857 में उनका role?

Jhansi defence और later military campaigns में active leadership.

Death कब हुई?

June 1858 में Gwalior campaign के दौरान।

क्या poem historical source है?

नहीं, यह literary patriotic work है।

उनकी legacy?

1857 resistance और women’s military leadership के enduring symbol के रूप में।

स्रोत और संदर्भ

  • Government freedom-movement and museum historical records
  • Modern scholarship on the 1857 uprising
टिप्पणियाँ (4)

4 टिप्पणियाँ

  1. झांसी की रानी के बारे में पढ़कर आज हमें यह अहसास हुआ कि हमारे नेताओं ने अंग्रेज़ों के साथ मिलकर सिर्फ सत्ता हस्तांतरण करा कर और विदेशी 125 कम्पनियों को लाईसेंस दे कर हमारे जांबाज क्रान्तिकारियों( जिन्होंने अंग्रेजों की बनाई हुई व्यवस्था से लड़ते लड़ते अपनी जान तक निछावर कर दी) के मुंह पर जोरदार तमाचा मारा है और आज तक विदेशी कम्पनियों को ला कर मारती चली आ रही है हमारे क्रान्तिकारियों को तभी सच्ची श्रद्धांजलि होगी जब हम सब भारतवासी मिल कर सरकार को इतना मजबूर कर दे कि वो विदेशी कम्पनियों को भारत से बाहर करें अन्यथा तरक्की के नाम पर हमारा देश गड्ढे में धसता चला जायेगा और हमारे क्रान्तिकारियों को सच्ची श्रद्धांजलि नहीं मिल पायेगी आप लोग किसी एक क्रांतिकारी के बारें में अपनी जगह रख कर सोचिए आप के दिल में देश के प्रति सच्चा प्यार जाग्रत हो जायेगा पूरे विश्व में जितनी अपार सम्पदा हमारे देश में है उतनी सम्पदा किसी भी देश में नहीं है फिर हम भारतवासी क्यों गरीबी की जिन्दगी जिएं आज से हमें अगर अपने भारत को बचाना है तो हम भारतवासी लोग प्ररण करे कि हम किसी विदेशी कम्पनियों का उत्पादित माल नहीं खरीदेंगे और अपनी खनिज सम्पदा पर विदेशी कम्पनियों का अधिकार है उसे सरकार को मजबूर करा कर उसे खत्म करवायेंगे :-जै हिन्द जै भारत देश।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.