कुचिपुड़ी नृत्य आंध्र प्रदेश की प्रसिद्ध भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैली है। इसका नाम कृष्णा जिले के कुचिपुड़ी गाँव से पड़ा। इसकी जड़ें पुरानी नृत्य-नाट्य परंपरा, यक्षगान, वैष्णव भक्ति और तेलुगु साहित्य में हैं। आधुनिक मंच पर दिखाई देने वाला एकल कुचिपुड़ी 20वीं सदी में व्यापक हुआ, लेकिन इसकी नृत्य-नाट्य परंपरा इससे कई शताब्दियाँ पुरानी है।
पुराने लेख में इसे “भारत के 11 मुख्य शास्त्रीय नृत्यों” में से एक और लगभग 20वीं सदी से शुरू हुई शैली बताया गया था। सामान्य सरकारी सांस्कृतिक वर्गीकरण में भारत की 8 प्रमुख शास्त्रीय नृत्य शैलियाँ बताई जाती हैं, जिनमें कुचिपुड़ी शामिल है। इसका ऐतिहासिक विकास विशेष रूप से 17वीं सदी के सिद्धेंद्र योगी और भामाकलापम् परंपरा से जुड़ा माना जाता है।
कुचिपुड़ी एक नजर में
| राज्य | आंध्र प्रदेश |
| नाम का स्रोत | कुचिपुड़ी गाँव, कृष्णा जिला |
| प्रमुख ऐतिहासिक व्यक्तित्व | सिद्धेंद्र योगी |
| प्रसिद्ध नृत्य-नाटिका | भामाकलापम् |
| मुख्य भाषा | तेलुगु; संस्कृत रचनाएँ भी |
| संगीत परंपरा | कर्नाटक संगीत |
| विशेष प्रस्तुति | तरंगम्, कभी पीतल की थाली पर संतुलित नृत्य |
कुचिपुड़ी नाम कहाँ से आया?
कुचिपुड़ी आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले का गाँव है, जो विजयवाड़ा से लगभग 35 किलोमीटर क्षेत्र में स्थित है। पुरानी वर्तनी में इसे कुचेलापुरम् या कुचेलापुरी जैसे नामों से भी जोड़ा गया है। इसी गाँव की नृत्य-नाट्य परंपरा आगे “कुचिपुड़ी” नाम से प्रसिद्ध हुई।
कुचिपुड़ी का इतिहास
आंध्र प्रदेश में नृत्य-नाट्य की लंबी परंपरा रही है। यक्षगान और भागवत-मेला जैसी कथा-प्रधान प्रस्तुतियों में संगीत, नृत्य, अभिनय और संवाद साथ चलते थे। कुचिपुड़ी इसी व्यापक तेलुगु नाट्य-परंपरा से विकसित हुई।
केंद्र सरकार के सांस्कृतिक संसाधन एवं प्रशिक्षण केंद्र के अनुसार 17वीं सदी में वैष्णव कवि और संत सिद्धेंद्र योगी ने कुचिपुड़ी शैली के यक्षगान को व्यवस्थित रूप दिया।
सिद्धेंद्र योगी कौन थे?
सिद्धेंद्र योगी कुचिपुड़ी परंपरा के सबसे महत्वपूर्ण नामों में हैं। उनके जीवन की सही तिथियों पर पूर्ण सहमति नहीं है, इसलिए उन्हें निश्चित जन्म-वर्ष के साथ प्रस्तुत करना सावधानी मांगता है।
परंपरा के अनुसार उन्होंने भगवान कृष्ण और सत्यभामा से जुड़ी कथा पर भामाकलापम् की रचना की और कुचिपुड़ी गाँव के ब्राह्मण बालकों को इसके प्रदर्शन का प्रशिक्षण दिया।
भामाकलापम् क्या है?
भामाकलापम् कुचिपुड़ी की सबसे प्रसिद्ध नृत्य-नाट्य रचनाओं में है। इसका केंद्र भगवान कृष्ण की पत्नी सत्यभामा का प्रेम, गर्व, विरह और आत्मबोध है। इसमें नृत्य के साथ अभिनय, गीत और संवाद का महत्वपूर्ण स्थान है।
पुराने लेख में इसे केवल “सत्यभामा का कृष्ण में विलीन होना” कहा गया था, जो कथा की गहराई को बहुत कम कर देता है।
1675 का गोलकुंडा संरक्षण
CCRT की प्रकाशित सामग्री के अनुसार गोलकुंडा के शासक अबुल हसन ताना शाह ने 1675 में कुचिपुड़ी गाँव को इस नृत्य परंपरा से जुड़े ब्राह्मण परिवारों को अनुदान के रूप में देने वाला ताम्रपत्र जारी किया था। इससे इस कला को संस्थागत संरक्षण मिला।
क्या कुचिपुड़ी पहले केवल पुरुष करते थे?
परंपरागत कुचिपुड़ी नृत्य-नाटकों में पुरुष ब्राह्मण कलाकारों की मंडलियाँ प्रमुख थीं। पुरुष कलाकार ही महिला पात्र, विशेषकर सत्यभामा, का अभिनय भी करते थे। इन्हें भागवतुलु परंपरा से जोड़ा जाता है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि आधुनिक कुचिपुड़ी “पुरुषों का ही नृत्य” है। 20वीं सदी में महिलाओं ने बड़ी संख्या में इसे सीखा और आज महिला तथा पुरुष दोनों कलाकार विश्वभर में कुचिपुड़ी प्रस्तुत करते हैं।
20वीं सदी में एकल कुचिपुड़ी का विकास
कुचिपुड़ी मूल रूप से सामूहिक नृत्य-नाटक था। 20वीं सदी में गुरु वेदांतम लक्ष्मीनारायण शास्त्री, वेम्पति चिन्ना सत्यम और अन्य आचार्यों ने एकल मंच प्रस्तुति, प्रशिक्षण और नई नृत्य-रचनाओं को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इसी दौर में कुचिपुड़ी गाँव से बाहर शहरों, विश्वविद्यालयों और राष्ट्रीय मंचों तक पहुँचा। पुराने लेख में बालासरस्वती को कुचिपुड़ी के पुनरुद्धार का प्रमुख नाम बताया गया था; वे मुख्यतः भरतनाट्यम की महान कलाकार थीं, इसलिए उस दावे को हटाया गया है।
वेम्पति चिन्ना सत्यम का योगदान
गुरु वेम्पति चिन्ना सत्यम ने आधुनिक कुचिपुड़ी की मंचीय भाषा को व्यापक पहचान दिलाई। उन्होंने अनेक नृत्य-नाटिकाएँ और एकल रचनाएँ तैयार कीं तथा बड़ी संख्या में कलाकारों को प्रशिक्षित किया।
उनकी शैली में साफ रेखाएँ, विस्तृत पदचालन और नाटकीय अभिव्यक्ति प्रमुख मानी जाती हैं।
कुचिपुड़ी में नृत्य और अभिनय
कुचिपुड़ी में शुद्ध नृत्य और कथात्मक अभिनय दोनों महत्वपूर्ण हैं। भारतीय नाट्य परंपरा के चार प्रकार के अभिनय यहाँ उपयोगी ढाँचा देते हैं:
- अंगिक: शरीर, हाथ, मुख और गति से अभिव्यक्ति
- वाचिक: संवाद, गीत और बोले गए शब्द
- आहार्य: पोशाक, आभूषण और मंच-सज्जा
- सात्त्विक: आंतरिक भावों की अभिव्यक्ति
क्या कलाकार खुद गाता भी है?
कुचिपुड़ी की पारंपरिक नृत्य-नाट्य शैली में वाचिक अभिनय की भूमिका अन्य कई शास्त्रीय नृत्यों की तुलना में अधिक स्पष्ट है और पात्र संवाद बोल सकते हैं। आधुनिक एकल मंच पर सामान्यतः अलग गायक और संगीतकार भी होते हैं। इसलिए “हर नर्तक हमेशा खुद गाता है” सार्वभौमिक नियम नहीं है।
दारु क्या है?
कुचिपुड़ी नृत्य-नाट्य में पात्रों के प्रवेश और परिचय से जुड़ी गीत-रचनाओं को दारु कहा जाता है। अलग पात्र अपनी पहचान, मनोदशा और कथा की स्थिति गीत तथा अभिनय से प्रस्तुत कर सकते हैं।
पुराने लेख में हर नृत्य-नाटिका में “लगभग 80 दारु” होना निश्चित नियम बताया गया था। रचना के अनुसार संख्या बदलती है, इसलिए ऐसी एक संख्या सार्वभौमिक नहीं है।
तरंगम् क्या है?
तरंगम् कुचिपुड़ी की प्रसिद्ध प्रस्तुति है। इसमें कृष्णलीला तरंगिणी जैसी रचनाओं पर नृत्य किया जा सकता है और कई मंच प्रस्तुतियों में कलाकार पीतल की थाली के किनारे पर खड़े होकर लयबद्ध नृत्य करता है। कभी सिर पर कलश संतुलित करने जैसे कौशल भी दिखाए जाते हैं।
यह हर कुचिपुड़ी प्रस्तुति का अनिवार्य हिस्सा नहीं है, लेकिन लोकप्रिय पहचान बन चुका है।
शब्दम् और जातिस्वरम्
आधुनिक कुचिपुड़ी कार्यक्रम में प्रार्थना, जातिस्वरम्, शब्दम्, शुद्ध नृत्य, पदम्, भामाकलापम् के अंश और तरंगम् जैसी अलग रचनाएँ शामिल हो सकती हैं। कार्यक्रम कलाकार और गुरु की शैली के अनुसार बदलता है।
कुचिपुड़ी की गति और शैली
कुचिपुड़ी की पहचान तेज और हल्के पदचालन, गोलाकार गतियों, नाटकीय भाव-अभिनय और मंच पर जीवंतता से जुड़ी है। इसमें लास्य की कोमलता और तांडव की ऊर्जा दोनों का उपयोग हो सकता है।
कुचिपुड़ी का संगीत
कुचिपुड़ी में मुख्यतः कर्नाटक संगीत परंपरा का उपयोग होता है। तेलुगु और संस्कृत की रचनाएँ प्रमुख हैं। संगीत मंडली में सामान्यतः इनमें से वाद्य हो सकते हैं:
- मृदंगम
- वायलिन
- बांसुरी
- वीणा या तंबूरा
- मंजीरा/नट्टुवांगम
वेशभूषा
महिला कलाकारों की आधुनिक कुचिपुड़ी पोशाक प्रायः साड़ी-आधारित नृत्य-वस्त्र होती है जिसमें सामने प्लीट्स, कमरबंद और पारंपरिक आभूषण होते हैं। पुरुष कलाकार धोती-आधारित पोशाक पहन सकते हैं। नृत्य-नाटक में पात्र के अनुसार पोशाक बदलती है।
आभूषण
कुचिपुड़ी की पारंपरिक मंडलियों में हल्के लकड़ी या अन्य सामग्री से बने आभूषणों की परंपरा का उल्लेख मिलता है। आज मंच पर अलग प्रकार के पारंपरिक नृत्य-आभूषण भी उपयोग किए जाते हैं। इसे केवल एक ही सामग्री का अनिवार्य नियम नहीं माना जाना चाहिए।
प्रमुख कुचिपुड़ी कलाकार और गुरु
- वेदांतम लक्ष्मीनारायण शास्त्री
- वेम्पति चिन्ना सत्यम
- वेदांतम सत्यनारायण शर्मा
- राजा रेड्डी और राधा रेड्डी
- यामिनी कृष्णमूर्ति
- शोभा नायडू
- चिंता कृष्णमूर्ति
- इंद्राणी रहमान
अलग कलाकारों ने पारंपरिक नृत्य-नाट्य, महिला प्रवेश, एकल प्रस्तुति, प्रशिक्षण और अंतरराष्ट्रीय प्रचार में अलग-अलग योगदान दिए।
कुचिपुड़ी और भरतनाट्यम में अंतर
| बिंदु | कुचिपुड़ी | भरतनाट्यम |
|---|---|---|
| मूल क्षेत्र | आंध्र प्रदेश | तमिलनाडु |
| ऐतिहासिक रूप | नृत्य-नाट्य/यक्षगान परंपरा | मंदिर और सदिर परंपरा से आधुनिक रूप |
| वाचिक अभिनय | पारंपरिक नाटक में अधिक स्पष्ट | सामान्यतः नर्तक संवाद नहीं बोलता |
| प्रसिद्ध विशेषता | तरंगम्, नृत्य-नाट्य | अरैमंडी, संरचित मार्गम् |
भरतनाट्यम के बारे में अलग लेख पढ़ सकते हैं।
कुचिपुड़ी और ओडिसी
दोनों भारतीय शास्त्रीय नृत्य हैं लेकिन उनकी मुद्रा, शरीर-रेखा, संगीत और क्षेत्रीय परंपरा अलग है। ओडिसी ओडिशा की त्रिभंगी और चौक जैसी शरीर-स्थितियों के लिए प्रसिद्ध है, जबकि कुचिपुड़ी तेलुगु नृत्य-नाट्य और तेज मंचीय गतियों से विशेष पहचान रखता है।
ओडिसी नृत्य का इतिहास भी पढ़ें।
कुचिपुड़ी और कथकली
कथकली केरल की अत्यधिक शैलीबद्ध नृत्य-नाट्य परंपरा है, जिसमें विस्तृत मुख-सज्जा और पात्र-प्रकार महत्वपूर्ण हैं। कुचिपुड़ी की मंचीय भाषा, पोशाक और संगीत इससे काफी अलग हैं।
कथकली नृत्य की जानकारी यहाँ पढ़ सकते हैं।
SSC और सामान्य ज्ञान के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
- कुचिपुड़ी आंध्र प्रदेश की शास्त्रीय नृत्य शैली है।
- इसका नाम कृष्णा जिले के कुचिपुड़ी गाँव से पड़ा।
- सिद्धेंद्र योगी का नाम इसके ऐतिहासिक विकास से जुड़ा है।
- भामाकलापम् सत्यभामा-कृष्ण कथा पर आधारित प्रसिद्ध रचना है।
- 1675 में गोलकुंडा के अबुल हसन ताना शाह से संरक्षण की परंपरा जुड़ी है।
- परंपरागत मंडलियों में पुरुष कलाकार महिला भूमिकाएँ भी निभाते थे।
- आधुनिक काल में महिला और पुरुष दोनों कुचिपुड़ी करते हैं।
- कर्नाटक संगीत इसका मुख्य संगीत आधार है।
- तरंगम् इसकी प्रसिद्ध मंचीय प्रस्तुति है।
पुराने लेख की प्रमुख गलतियाँ
| पुराना दावा | सही जानकारी |
|---|---|
| भारत में 11 मुख्य शास्त्रीय नृत्य | सामान्य सरकारी सूची में 8 प्रमुख शास्त्रीय नृत्य मान्य हैं। |
| कुचिपुड़ी 20वीं सदी में शुरू हुआ | नृत्य-नाट्य परंपरा कई शताब्दियाँ पुरानी; आधुनिक एकल रूप 20वीं सदी में विस्तृत हुआ। |
| बालासरस्वती ने कुचिपुड़ी पुनर्जीवित किया | वे मुख्यतः भरतनाट्यम की महान कलाकार थीं; कुचिपुड़ी के प्रमुख गुरुओं के नाम अलग हैं। |
| हर कलाकार खुद गाता है | पारंपरिक नाटक में वाचिक अभिनय महत्वपूर्ण है; आधुनिक एकल मंच पर अलग गायक भी होते हैं। |
| हर नृत्य नाटिका में 80 दारु | संख्या रचना के अनुसार बदलती है। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कुचिपुड़ी किस राज्य का नृत्य है?
आंध्र प्रदेश का।
कुचिपुड़ी का नाम किससे पड़ा?
आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले के कुचिपुड़ी गाँव से।
भामाकलापम् किससे जुड़ा है?
सिद्धेंद्र योगी और सत्यभामा-कृष्ण की नृत्य-नाट्य कथा से।
तरंगम् क्या है?
कुचिपुड़ी की प्रसिद्ध प्रस्तुति जिसमें कलाकार कभी पीतल की थाली पर संतुलन रखते हुए नृत्य करता है।
क्या कुचिपुड़ी केवल महिलाएँ करती हैं?
नहीं। इसकी परंपरा ऐतिहासिक रूप से पुरुष मंडलियों से जुड़ी थी और आज महिला तथा पुरुष दोनों कलाकार करते हैं।
निष्कर्ष
कुचिपुड़ी केवल तेज पदचालन या पीतल की थाली पर नृत्य का नाम नहीं है। यह आंध्र प्रदेश की समृद्ध नृत्य-नाट्य परंपरा है जिसमें संगीत, तेलुगु साहित्य, अभिनय, संवाद और वैष्णव कथाएँ एक साथ जुड़ती हैं। सिद्धेंद्र योगी की भामाकलापम् परंपरा से लेकर आधुनिक गुरुओं के एकल मंच तक इसका रूप बदलता रहा, लेकिन कथा और अभिनय इसकी पहचान के केंद्र में बने रहे।
विश्वसनीय स्रोत
Image Credit – Yamini Reddy / Wikimedia Commons
nice good bagundi nanu
So good content in Hindi exellent