मोरारजी देसाई भारत के चौथे प्रधानमंत्री और इस पद पर पहुंचने वाले पहले गैर-कांग्रेसी नेता थे। उन्होंने 24 मार्च 1977 से 28 जुलाई 1979 तक जनता पार्टी सरकार का नेतृत्व किया। स्वतंत्रता सेनानी, बंबई राज्य के मुख्यमंत्री, केंद्रीय वित्त मंत्री और उप-प्रधानमंत्री के रूप में भी उनका लंबा सार्वजनिक जीवन रहा।
29 फरवरी 1896 को जन्मे देसाई अनुशासन, प्रशासनिक सख्ती और गांधीवादी विचारों के लिए पहचाने जाते हैं। 1975–77 के आपातकाल के बाद बनी उनकी सरकार ने नागरिक स्वतंत्रताओं और संवैधानिक सुरक्षा को मजबूत करने वाले कदम उठाए। उन्हें 1991 में भारत रत्न और 1990 में पाकिस्तान का निशान-ए-पाकिस्तान सम्मान मिला।
मोरारजी देसाई का संक्षिप्त परिचय
| विषय | जानकारी |
|---|---|
| पूरा नाम | मोरारजी रणछोड़जी देसाई |
| जन्म | 29 फरवरी 1896 |
| जन्मस्थान | भदेली गांव, तत्कालीन बंबई प्रेसीडेंसी; वर्तमान गुजरात |
| पिता | रणछोड़जी देसाई, स्कूल शिक्षक |
| पत्नी | गजराबेन देसाई |
| प्रमुख दल | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, कांग्रेस (ओ) और जनता पार्टी |
| भारत के प्रधानमंत्री | 24 मार्च 1977–28 जुलाई 1979 |
| प्रधानमंत्री क्रम | चौथे प्रधानमंत्री |
| प्रमुख सम्मान | निशान-ए-पाकिस्तान (1990), भारत रत्न (1991) |
| मृत्यु | 10 अप्रैल 1995, मुंबई |
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
मोरारजी देसाई का जन्म भदेली गांव में हुआ था, जो अब गुजरात के वलसाड जिले में है। उनके पिता स्कूल शिक्षक और अनुशासनप्रिय व्यक्ति थे। परिवार से उन्हें मेहनत, सादगी और सत्य पर टिके रहने की शिक्षा मिली। उनका जन्म 29 फरवरी को हुआ था, इसलिए उनकी वास्तविक जन्मतिथि लीप वर्ष में ही आती थी।
उन्होंने सेंट बुसर हाई स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की और आगे की पढ़ाई मुंबई के Wilson College में की। स्नातक शिक्षा पूरी करने के बाद 1918 में वे तत्कालीन बंबई प्रांत की सिविल सेवा में शामिल हुए। उन्होंने लगभग 12 वर्ष तक Deputy Collector के रूप में कार्य किया। प्रशासनिक सेवा के इस अनुभव ने उनके बाद के राजनीतिक जीवन और शासन संबंधी दृष्टिकोण को प्रभावित किया।
सरकारी नौकरी छोड़कर स्वतंत्रता आंदोलन में प्रवेश
1930 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन तेज होने पर देसाई ने ब्रिटिश सरकार की नौकरी छोड़ दी। इसके बाद वे कांग्रेस और स्वतंत्रता संघर्ष में सक्रिय हो गए। वे 1931 में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सदस्य बने और 1937 तक गुजरात प्रदेश कांग्रेस समिति के सचिव रहे।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। व्यक्तिगत सत्याग्रह में भाग लेने पर उनकी गिरफ्तारी हुई और अक्टूबर 1941 में रिहाई मिली। अगस्त 1942 के स्वतंत्रता संघर्ष के व्यापक दौर में भारत छोड़ो आंदोलन के समर्थन के कारण उन्हें फिर गिरफ्तार किया गया; इस बार वे 1945 में रिहा हुए। गांधीवादी आंदोलनों को समझने के लिए दांडी मार्च और नमक सत्याग्रह भी पढ़ सकते हैं।
प्रांतीय राजनीति और बंबई के मुख्यमंत्री
1937 में प्रांतीय स्वायत्तता के अंतर्गत कांग्रेस सरकार बनने पर देसाई को बंबई प्रांत में राजस्व, कृषि, वन और सहकारिता विभागों की जिम्मेदारी मिली। द्वितीय विश्वयुद्ध में भारतीयों की सहमति के बिना देश को शामिल करने के विरोध में 1939 में कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने इस्तीफा दे दिया।
1946 के प्रांतीय चुनावों के बाद देसाई बंबई में गृह और राजस्व मंत्री बने। इस अवधि में काश्तकारों के अधिकार और भू-राजस्व प्रशासन से जुड़े सुधारों पर काम हुआ। 1952 में वे बंबई राज्य के मुख्यमंत्री बने। उनका प्रशासन सख्त कानून-व्यवस्था और वित्तीय अनुशासन के लिए जाना गया, लेकिन भाषाई आधार पर महाराष्ट्र और गुजरात की मांग से जुड़े आंदोलन के दौरान पुलिस कार्रवाई उनकी विरासत का विवादित पक्ष भी है।
केंद्रीय मंत्री और वित्त मंत्री के रूप में भूमिका
राज्यों के पुनर्गठन के बाद 14 नवंबर 1956 को मोरारजी देसाई केंद्र सरकार में वाणिज्य और उद्योग मंत्री बने। 22 मार्च 1958 से उन्होंने वित्त मंत्रालय संभाला। वित्त मंत्री के रूप में उन्होंने सरकारी खर्च में मितव्ययिता, राजस्व बढ़ाने और घाटे को नियंत्रित रखने पर जोर दिया।
उन्होंने अलग-अलग कार्यकालों में केंद्रीय बजट पेश किए। सरकारी अभिलेखों के अनुसार वे संसद में सर्वाधिक बार बजट प्रस्तुत करने वाले प्रमुख वित्त मंत्रियों में गिने जाते हैं। उनकी बजट नीतियों का व्यापक संदर्भ समझने के लिए भारत में विमुद्रीकरण के इतिहास वाला लेख भी उपयोगी है।
1963 में कामराज योजना के अंतर्गत उन्होंने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दिया। बाद में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने उन्हें प्रशासनिक सुधार आयोग का अध्यक्ष बनने के लिए कहा। 1967 में वे इंदिरा गांधी की सरकार में उप-प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री बने। जुलाई 1969 में वित्त मंत्रालय वापस लिए जाने के बाद उन्होंने उप-प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।
कांग्रेस विभाजन, विपक्ष और आपातकाल
1969 में कांग्रेस के विभाजन के बाद देसाई कांग्रेस (संगठन) के साथ रहे और विपक्ष की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे 1971 में लोकसभा के लिए चुने गए। 1975 में भंग गुजरात विधानसभा के चुनाव कराने की मांग को लेकर उन्होंने अनिश्चितकालीन उपवास किया। इसके बाद जून 1975 में चुनाव हुए और विपक्ष समर्थित जनता मोर्चा को सरकार बनाने का अवसर मिला।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा इंदिरा गांधी का लोकसभा चुनाव निरस्त किए जाने के बाद देसाई ने उनके इस्तीफे की मांग की। 26 जून 1975 को आपातकाल लागू होने पर उन्हें अन्य विपक्षी नेताओं के साथ गिरफ्तार कर लिया गया। वे लगभग 19 महीने हिरासत में रहे और 18 जनवरी 1977 को रिहा हुए।
भारत के प्रधानमंत्री कैसे बने?
आपातकाल हटने के बाद मार्च 1977 में छठी लोकसभा के चुनाव हुए। विपक्षी दल जनता पार्टी के मंच पर एकजुट हुए और कांग्रेस को पराजित किया। देसाई सूरत निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा सदस्य चुने गए तथा जनता पार्टी संसदीय दल के नेता बने। 24 मार्च 1977 को उन्होंने भारत के चौथे प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली।
उनका प्रधानमंत्री बनना ऐतिहासिक था क्योंकि केंद्र में पहली बार कांग्रेस के बाहर किसी दल के नेता ने सरकार बनाई। उस समय उनकी आयु 81 वर्ष थी। भारत के अन्य प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल की तुलना भारत के प्रधानमंत्रियों की सूची में देखी जा सकती है।
प्रधानमंत्री के रूप में प्रमुख कार्य
लोकतांत्रिक संस्थाओं की बहाली
जनता पार्टी सरकार की प्राथमिकता आपातकाल के दौरान लगाए गए प्रतिबंधों को हटाना और लोकतांत्रिक संस्थाओं में विश्वास बहाल करना था। राजनीतिक बंदियों को छोड़ा गया, प्रेस पर लगे नियंत्रण हटाए गए और आपातकाल के निर्णयों की जांच के लिए शाह आयोग बनाया गया।
44वां संविधान संशोधन
1978 के 44वें संविधान संशोधन ने राष्ट्रीय आपातकाल घोषित करने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण सुरक्षा जोड़ी। “आंतरिक अशांति” के स्थान पर “सशस्त्र विद्रोह” को आधार बनाया गया और मंत्रिमंडल की लिखित सलाह जैसी शर्तें जोड़ी गईं। जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े अनुच्छेद 20 और 21 के अधिकारों को आपातकाल में भी निलंबित न किए जाने की सुरक्षा मिली। इन परिवर्तनों का उद्देश्य 1975 जैसी स्थिति की पुनरावृत्ति कठिन बनाना था।
विदेश नीति
देसाई सरकार ने पड़ोसी देशों के साथ संबंध सुधारने और संवाद पर जोर दिया। पाकिस्तान तथा चीन के साथ संपर्क बढ़ाने की कोशिश हुई और गुटनिरपेक्ष नीति को जारी रखा गया। उनकी सरकार का दृष्टिकोण विदेश नीति में तनाव घटाने का था, हालांकि देश की सुरक्षा और खुफिया नीति से जुड़े कुछ लोकप्रिय दावे बाद की पुस्तकों पर आधारित हैं और उन पर एकमत ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है।
सरकार क्यों गिरी और उन्होंने इस्तीफा कब दिया?
जनता पार्टी अलग-अलग राजनीतिक धाराओं के मेल से बनी थी। पार्टी के भीतर नेतृत्व, संगठन और दोहरी सदस्यता जैसे मुद्दों पर मतभेद बढ़ते गए। चौधरी चरण सिंह और उनके समर्थकों ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया। बहुमत कमजोर होने पर मोरारजी देसाई ने जुलाई 1979 में प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया; उनका आधिकारिक कार्यकाल 28 जुलाई 1979 तक माना जाता है।
प्रधानमंत्री पद छोड़ने के बाद वे सक्रिय सत्ता राजनीति से दूर हो गए, हालांकि सार्वजनिक मुद्दों पर उनकी रुचि बनी रही। उनका कार्यकाल छोटा था, लेकिन उसने भारत में शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन और बहुदलीय लोकतंत्र की संभावना को स्थापित किया।
विचार, जीवनशैली और सार्वजनिक छवि
मोरारजी देसाई स्वयं को गांधीवादी मानते थे और व्यक्तिगत अनुशासन, शाकाहार, योग, संयम तथा सादगी पर जोर देते थे। सार्वजनिक जीवन में उनकी छवि ईमानदार लेकिन कठोर प्रशासक की रही। वे मानते थे कि प्रधानमंत्री सहित कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं होना चाहिए।
उनकी नीतियों और राजनीतिक निर्णयों पर मतभेद रहे हैं। विशेष रूप से बंबई राज्य के भाषाई आंदोलन, जनता पार्टी के आंतरिक संघर्ष और प्रशासनिक शैली की आलोचना की जाती है। एक संतुलित जीवनी में उपलब्धियों के साथ इन विवादित पहलुओं को भी देखना जरूरी है।
सम्मान और मृत्यु
पाकिस्तान ने 1990 में मोरारजी देसाई को अपना सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान-ए-पाकिस्तान प्रदान किया। भारत सरकार ने 1991 में उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया। इन दोनों देशों के उच्च नागरिक सम्मान पाने वाले वे विशिष्ट भारतीय नेताओं में हैं।
10 अप्रैल 1995 को मुंबई में 99 वर्ष की आयु में मोरारजी देसाई का निधन हुआ। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर लोकतांत्रिक सत्ता परिवर्तन तक फैला उनका लंबा सार्वजनिक जीवन आधुनिक भारतीय राजनीति का महत्वपूर्ण अध्याय है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
मोरारजी देसाई भारत के कौन-से प्रधानमंत्री थे?
वे भारत के चौथे प्रधानमंत्री और इस पद पर पहुंचने वाले पहले गैर-कांग्रेसी नेता थे।
मोरारजी देसाई का कार्यकाल कब था?
उनका प्रधानमंत्री कार्यकाल 24 मार्च 1977 से 28 जुलाई 1979 तक था।
मोरारजी देसाई का जन्म कब और कहां हुआ?
उनका जन्म 29 फरवरी 1896 को भदेली गांव में हुआ था, जो वर्तमान गुजरात के वलसाड जिले में है।
उन्हें भारत रत्न कब मिला?
भारत सरकार ने 1991 में मोरारजी देसाई को भारत रत्न प्रदान किया था।
मोरारजी देसाई सरकार की प्रमुख संवैधानिक उपलब्धि क्या थी?
उनकी सरकार के समय पारित 44वें संविधान संशोधन ने राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा और मौलिक अधिकारों के निलंबन पर महत्वपूर्ण सुरक्षा जोड़ी।